दिल से ग़ज़ल तक

 
लोरी सुना रही है, हिंदी ज़ुबाँ की ख़ुशबू
रग-रग से आ रही है, हिन्दोस्ताँ की ख़ुशबू
 
भारत हमारी माता, भाषा है उसकी ममता
आँचल से उसके आती सारे जहाँ की ख़ुशबू
 
भाषा अलग-अलग है, हर क्षेत्र की ये माना
है एकता में शामिल हर इक ज़बाँ की ख़ुशबू
 
भाषा की टहनियों पे हर प्रांत के परिंदे
उड़कर जहाँ भी पहुँचे, पहुँची वहाँ की ख़ुशबू
 
शायर ने जो चुनी है शेरो-सुख़न की भाषा
आती मिली-जुली सी उसके बयाँ की ख़ुशबू
 
महसूस करना चाहो, धड़कन में माँ की कर लो
उस अनकही ज़बां से, इक बेज़बाँ की ख़ुशबू
 
परदेस में जो आती मिट्टी की सौंधी-सौंधी
ये तो मेरे वतन की है गुलिस्ताँ की ख़ुशबू
 
दीपक जले है हरसू भाषा के आज ‘देवी’
लोबान जैसी आती कुछ-कुछ वहाँ की ख़ुशबू। 
 

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