दिल से ग़ज़ल तक

  
लहू से लिखी वीरता की कहानी 
सुनाती हूँ अपनी क़लम की ज़ुबानी
 
वहीं जान को होम डाला उन्होंने 
जहाँ दहशतों की रही हुक्मरानी
 
रक़ीबों के सीने पे आघात सहकर 
रही मुस्कराती जवानी दीवानी
 
लहू जो बहा है सरे-जंगे-मैदाँ 
गुहर है वो अनमोल, समझो न पानी
 
शहीदों के तन से जो लिपटा तिरंगा 
उन्हें बा-अदब दे रहा है सलामी 
 
हमारे ही कुन्बे के हैं वे सभी जो 
लुटाते हैं सरहद पे ‘देवी’ जवानी

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