दिल से ग़ज़ल तक

दिल से ग़ज़ल तक  (रचनाकार - देवी नागरानी)

73. आईना है दिखा रहा कोई

 

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आईना है दिखा रहा कोई
ख़ुद से मुझको मिला रहा कोई
 
मेरे गीतों को गा रहा कोई
अपना चेहरा छुपा रहा कोई
 
अपना सब कुछ लुटा के अब देखो 
मुझको मुझसे चुरा रहा कोई
 
भूल कर भी न भूल पाए जिसे 
याद उसकी दिला रहा कोई
 
अनछुए पहलुओं में है क्या ये 
स्पर्श करके बता रहा कोई
 
छू रहा हो गुलाब को ऐसे 
जैसे मरहम लगा रहा कोई 
 
गिर के उठता था उठ के गिरता था
जैसे सूली उठा रहा कोई
 
दिल का रौशन चराग़ करने को 
ख़ून अपना जला रहा कोई
 
दर्द दारू दवा का नुख्सा ले
जाम ‘देवी’ पिला रहा कोई

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