दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    1212    22  
 
तू न था कोई और था फिर भी
याद का सिलसिला चला फिर भी
 
आमना सामना हुआ फिर भी 
तू न आँखें मिला सका फिर भी
 
मैं थी गूँगी वो बहरा था फिर भी 
दिल की धड़कन वो सुन सका फिर भी
 
गो परिंदा वो दिल का घायल था
सोच के पर लगा उड़ा फिर भी
 
शहर सारा तू छानता ही रहा
राह इक बार पूछता फिर भी
 
तोहमतें तू लगा मगर पहले 
फितरतों को समझ ज़रा फिर भी 
 
कर दिया ख़्वाहिशों से दिल ख़ाली
क्यों न ‘देवी’ कभी भरा फिर भी 

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