दिल से ग़ज़ल तक

 

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ख़ुदी आस्माँ को लगी जब से छूने
मिले थे वहीं सायबाँ देखो कितने 
 
शराफ़त ने ईमाँ के सौदे किए जब
सुने सच ने तब थे बयाँ देखो कितने 
 
छुपी है कहाँ जाके ग़ैरत न पूछो
नक़ाबों में चेहरे अयाँ देखो कितने
 
डहे घर पुरानी कई बस्तियों में 
बने है नये अब मकाँ देखो कितने 
 
ज़मीं टुकड़ों टुकड़ों में जैसे बँटी है 
बँटे वैसे ही आसमाँ देखो कितने 
 
अदालत घरों में है घुस आई अब तो 
हैं मुन्सिफ़ ही मुन्सिफ़ यहाँ देखो कितने
 
मुसीबत में कोई न था साथ मेरे 
सफलता में थे कारवाँ देखो कितने
 
लगी मुस्कुराने अदालत में ‘देवी’
पड़े सच को सुनने बयाँ देखो कितने
 

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