दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    212  

इश्क़ में जब वो किसी का हो गया
था जो अपना वो पराया हो गया
 
रिश्ते कच्चे धागों से कमज़ोर थे
तोड़ उनको वो पराया हो गया 
 
जब तबीयत पर मेरे उँगली उठी
नाम मेरा इक लतीफ़ा हो गया
 
जीत कर दिल कर लिया हासिल वो सब 
जो था मेरा सब वो उसका हो गया 
 
रोटी ग़ुर्बत की न भाई जब उसे 
वो अमीरों का निवाला हो गया
 
ग़म की सूली पे वो लटका जीते जी
टूट कर ‘देवी’ मसीहा हो गया

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