दिल से ग़ज़ल तक

 

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मिट्टी को देके रूप नया बुत बना दिया 
हाथों से फिर तराश के चहरा नया दिया 
 
रौशन चराग़ यादों का दिल ने जला दिया
तारीकियों के साए ने उसको बुझा दिया
  
जो जल उठा चराग़ था दिल में यूँ यक-ब-यक
उसको अना की आँच से फिर क्यों बुझा दिया
 
ख़तरे में देख अपनों को आया उबाल जब 
तब ख़ून अपना पानी समझ कर बहा दिया
 
पहले तराशा हाथ से ‘देवी’ वुजूद को
फिर शहर भर के हाथों में पत्थर थमा दिया

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