मैं दिमाग़ी पैदल हूँ

01-09-2026

मैं दिमाग़ी पैदल हूँ

डॉ. अशोक गौतम (अंक: 301, सितम्बर प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हमारे महल्ले में हफ़्तों पानी आए या न आए। हमारे महल्ले में दिनों बिजली गुल रहे तो रहे। हमारे महल्ले में बिजली गुल होने की बीसियों बेकार की शिकायतें करने के बावजूद कोई बिजली विभाग की ओर से बिजली ठीक करने आए या न आए, हमारे महल्ले में सड़क साफ़ करने वाले हफ़्तों नहीं, महीनों आएँ या न आएँ, पर प्रजा प्रिय सरकार की ओर से कोई न कोई, किसी न किसी की गणना, कोई न कोई सर्वे करने वाले सरकारी देवदूत आए दिन आते रहते हैं। हालाँकि महल्ले के कुछ दिमाग़ी नक्सली पानी न आने, बिजली गुल रहने, सड़कों की सफ़ाई न होने पर आए दिन हो-हल्ला करते रहते हैं। हो-हल्ला करना इन दिमाग़ी नक्सलियों का धर्म है तो उनके हो-हल्ले से व्यवस्था के कान पर जूँ तक न रेंगना व्यवस्था का पेशा। ऐसे में मैं बस, अपनी अनर्जी बचाए रखता हूँ।

गणना करने वालों के क्रम में कल एक और गणना करने वाले सरकारी गणक हमारे महल्ले में कोई गणना करते मेरे घर आ पहुँचे।

अजीब है मेरे घर के दरवाज़े पर लगी घंटी भी, जब कोई सरकारी कर्मचारी किसी काम से आता है तो एकदम ठीक हो जाती है। मतलब, अब सरकारी कर्मचारियों से दरवाज़े पर लगी ख़राब घंटी तक डरने लगी है।

दरवाज़े की घंटी के ख़राब बटन की ओर ज्यों ही उन्होंने व्यवस्थागत उँगली बढ़ाई ही कि ख़राब बटन पर व्यवस्थागत उँगली पड़ने से पहले ही दरवाज़े की घंटी बज उठी तो मैं तुरंत समझ गया कि शर्तिया सरकारी कर्मचारी पधारा है। कोई पड़ोसी-वड़ोसी होता तो लाख बजाने के बाद भी घंटी न बजती। घंटी बजते ही मैंने भीतर से अनादर करते ससादर पूछा, “जनाब कौन? कहाँ से तशरीफ़ लाए हैं?”

“सरकार की ओर से तशरीफ़ लाया हूँ।”

“सेवा करवाने आए हो या . . .?”

“नहीं गणना द्वारा सेवा करने आया हूँ।”

“जनाब किसकी? गधों की?”

“नहीं, वह पिछले महीने कर गया था।”

“तो जनाब उल्लुओं की?”

“नहीं, वह उससे पिछले महीने कर गया था।”

“तो जनाब झोटों की?”

“नहीं। उसे करने के अभी सरकारी आदेश नहीं हुए हैं?” 

“तो सरकारी नसबंदी हो जाने के बाद भी अपनी संख्या बढ़ा रहे कुत्तों की?”

“नहीं! दिमाग़ी नक्सलियों की,” कह जनाब ने दरवाज़ा खोलने का अनायास प्रयास किया कि उससे पहले मैंने ही डरते हुए दरवाज़ा खोल दिया ताकि उस वक़्त तो कम से कम मैं दिमाग़ी होते हुए भी दिमाग़ी नक्सली न लगूँ।

वे सीना चौड़ा रख भीतर आए। आते ही इधर-उधर झाँका। कोई दिमाग़ी नक्सली होने की निशानी ढूँढ़ रहे थे शायद! ताक-झाँक करने के बाद बोले, “घर में कितने रहते हैं?”

“कौन जनाब?”

“दिमाग़ी नक्सली।”

“दिमाग़ी नक्सली तो कोई नहीं। दिमाग़ी पैदल चार रहते हैं।”

“श्योर?”

“श्योर नहीं जनाब! डेड श्योर।”

“सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया जाए?”

“जी जनाब!”

“जेन-जी कितने हैं?”

“दो हैं।”

“और जेन-डी?”

“जेन-डी बोले तो?” मैंने अघोषित नई जेनरेशन जेन-डी के बारे में पूछा तो वे बोले, “जेन-डी बोले तो डिस्टर्ब्ड जेनरेशन!”

“वह तो केवल मैं हूँ,” मैंने जो मैं हूँ, उसे खुले मन से हँसते हुए स्वीकारा कि अचानक उन्हें सामने टेबल पर कुछ किताबें, पत्रिकाएँ दिखीं तो वे मेरे दिमाग़ी पैदल होने पर सवाल खड़ा करते बोले, “तुम झूठ बोलते हो कि तुम दिमाग़ी नक्सली नहीं?”

“नहीं जनाब! सच बोल रहा हूँ। आपकी क़सम!”

“देखो! मेरी क़सम मत खाओ! अभी मेरी बहुत लंबी सर्विस पड़ी है। मुझे सरकार जनता को अभी बहुत खाना है। तो ये टेबल पर किताबें, पत्रिकाएँ क्यों?”

“ये कहानियों की किताबें, पत्रिकाएँ हैं जनाब! यथार्थ दर्शन की नहीं। जनाब! दिमाग़ी पैदल मनोहर कहानियाँ, कविताएँ पढ़ते हैं, समाज के सच नहीं,” मैंने कहा तो वे मुझसे कुछ-कुछ संतुष्ट हुए और कुछ-कुछ असंतुष्ट रहे। आख़िर अपनी बची हुई असंतुष्टि को ख़त्म करने के लिए उन्होंने अपने सरकारी बैग से प्रश्नावली निकाली और मुझसे बोले, “सरकार ने एक प्रश्नावली तैयार की है।”

“किस लिए जनाब?”

“ताकि इससे प्रश्न पूछ कर दिमाग़ी नक्सलियों और दिमाग़ी पैदलों को को अलग-अलग किया जा सके।”

“तो पूछिए जनाब! हाथ कंगन को आरसी क्या, दिमाग़ी पैदल को फ़ारसी क्या?”

“मतलब तुम फ़ारसी जानते हो? पढ़े-लिखे हो?”

“पढ़ा-लिखा था, जब था। विवाह के बाद से दिमाग़ी पैदल चल रहा हूँ। बस, दादी के समय का पता नहीं क्यों मुहावरा याद आ गया,” मैंने क्षमा याचना सहित विनम्र निवेदन किया तो वे कुछ विनम्र हुए, “तो मेरा पहला प्रश्न—तुम सरकार को रक्षक मानते हो या भक्षक?”

“यह भी कोई सवाल हुआ जनाब! मैं तो सरकार को प्रजा का रक्षक मानता हूँ।”

“चाहे वह भक्षक हो?”

“जो सरकार को, सपने में भी भक्षक होते हुए, भक्षक माने उसके दिमाग़ में कीड़े पड़ें, वह भी गज़-गज़ भर लंबे,” उनके प्रश्न का उत्तर दे मैंने अपने को दूसरे प्रश्न के लिए तैयार किया।

“तुम्हारे लिए सरकार किसका रूप है?”

“जनाब! देवता का।”

“और सरकार के कर्मचारी?”

“जनाब! देवता के देवदूत।”

“मतलब?”

“मतलब जनाब ये कि जहाँ-जहाँ देवता ख़ुद नहीं जा सकते, वहाँ-वहाँ वे अपने कर्मचारियों उर्फ़ अपने देवदूतों को प्रजा का हिम करने को भेज देते हैं,” सुन उनका सीना पाँच इंच बढ़ा। 
 
“तुम्हें कभी नहीं लगा कि देवता के किसी निर्णय का तुम्हें विरोध करना चाहिए? उससे सवाल पूछना चाहिए?”

“जनाब नहीं। कभी नहीं लगा। सरकार से सवाल पूछना सबसे नीचता का काम है। जिन्होंने उनसे सवाल पूछे, उन उनको उनका श्राप ऐसा लगा कि . . . ऐसा लगा कि . . .”

“अगर सरकार अपने एजेंडे को लेकर प्रजा विरोधी काम करे तो तुम उसे क्या मानते हो?”

“जनाब! प्रजा के पिछले जन्म के पाप।”

“क्या सरकार जन-कल्याण के नाम पर अपना, अपनों का कल्याण करती है?”

“जनाब! अब सरकार कुछ काम तो करती नहीं। पर पेट तो उसके और उसके अपनों के भी तो लगे हैं। ऐसे में जो वह प्रजा के असंख्य पेटों में से केवल एक-एक दाना ले-ले तो प्रजा का इससे बड़ा सरकार-हित में त्याग क्या!”

“क्या सरकार का कोई गुप्त एजेंडा होता है?”

“नहीं जनाब! सरकार आसमान से भी अधिक खुली होती है।”

“सरकार किसके कल्याण के लिए बनी होती है, प्रजा के या पूँजीपतियों के?”

“पूँजीपति भी तो पूँजीपति से पहले प्रजा ही होते हैं जनाब!”

“तुम्हारा कोई अपना विचार या विचारधारा?”

“नहीं जनाब! मेरे तो विचार भी सरकार के और विचारधारा भी सरकार की।”

“मतलब?” पूछ वे मुझे भीतर से घूरे तो मैंने कहा, “जनाब! अपना तो न कोई विचार, न कोई विचारधारा। केवल सरकार का जयकारा।”

“मज़ाक तो नहीं कर रहे हो?”

“जनाब! दिमाग़ से पैदल न मज़ाक करता है, न मज़ाक समझता है।”

“गुड!” प्रश्नावली में प्रश्नों के मेरे द्वारा दिए उत्तरों को सुन ज्यों-ज्यों वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए, त्यों-त्यों वे प्रसन्न से अधिक प्रसन्न होते गए कि हमारे महल्ले में अभी भी कोई तो दिमाग़ी पैदल है।

“प्रजा का असली धर्म क्या है?”

“सरकार की, दिमाग़ मूँद जय-जयकार करना।”

“जो कोई जय-जयकार न करे तो?”

“तो उसे तत्काल घुसपैठिया क़रार दे देश निकला दे दिया जाए।”

“क्या तुम अपने को दिमाग़ी पैदल मानते हो?”

“मानता ही नहीं जनाब! शर्तिया दिमाग़ी पैदल हूँ। आपके पास समय हो तो मैं अपना दिमाग़ खोलकर आपको उसका पैदलपन दिखा सकता हूँ।”

“और तुम्हारी बीवी?”

“वह तो जनाब मुझसे भी अधिक दिमाग़ी पैदल है। विवाह के समय छत्तीस नहीं, सैंतीस गुण मिले थे हमारे। कुछ भी नहीं सोचती। बस, हरदम बौराई सरकार! सरकार! सरकार! सरकार कहिए! जाहि विधि राखे सरकार, ताहि विधि रहिए, सरकारी मीरा हो बेसुध गाती रहती है। वह तो अपने प्रभु की भक्त नहीं, उन्मुक्त भक्त है।”

“और जो तुम्हारे घर में जेन-जी हैं, वे क्या हैं?”

“जनाब! नया-नया ख़ून है। जवानी के जोश में थोड़े-थोड़े दिमाग़ी नक्सली से हैं। बाप से भी सवाल पूछ लेते हैं। लाख समझाने के बाद भी भगवान स्वरूप बाप तक का भी विरोध कर लेते हैं। वैसे मैं उन्हें अपनी तरह का बनाने की कोशिश तो पूरी कर रहा हूँ ताकि . . . उन्हें जब विकास के झूठ की सच्चाइयों का पता चलेगा तो तय है धीरे-धीरे वे भी . . .”

“गुड! अब अगली कोई गणना सरकार ने कराई तो पुनः कष्ट देने आऊँगा,” जनाब ने मुझे और मेरी धर्मपत्नी को कम्पलिटली दिमाग़ी पैदल के कॉलम में और मेरी जेन-जी को संभावित दिमाग़ी पैदल के कॉलम में डाल अपने काग़ज़ लपेटे और अगले घर की ओर लपके। 

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