अहम् पवित्रम् वैशाखनंदनम्

15-09-2026

अहम् पवित्रम् वैशाखनंदनम्

डॉ. अशोक गौतम (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

अब मुझे कोई जो समझता हो, समझता रहे। मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ उनको पड़ता है जो असल में जो होते हैं, अपने को सार्वजनिक लाइफ़ में वह न मानने के बाद भी समाज में यह अफ़वाह फैल जाती है कि उनसे सावधान! जो वे दिखते हैं, वे वे नहीं हैं। वे कुछ और ही हैं। ऐसा होने पर समाज द्वारा उनकी बदनामी उतनी नहीं होती, जितनी उनके द्वारा उनकी ख़ुद हो जाती है।

अब अपने को फ़र्क़ डालना मैंने छोड़ दिया है। जो मैं हूँ ही नहीं, मुझे वह कहने पर परेशान तो ख़ैर, मैं पहले भी नहीं हुआ करता था। कोई मुझे गधा कहता, समझता है, तो अब मैं परेशान नहीं होता। कारण, जो ख़ुद जो होगा वह आपको वही कहेगा, समझेगा न! कोई मुझे उल्लू कहता, समझता है तो अब मैं परेशान नहीं होता। कारण, जो ख़ुद जो होगा वह आपको वही कहेगा, समझेगा न! कोई मुझे उल्लू का पट्ठा कहता, समझता है तो अब मैं परेशान नहीं होता। कारण, जो ख़ुद जो होगा, वह आपको वही कहेगा, समझेगा न! कोई मुझे सूअर समझता है तो अब मैं परेशान नहीं होता। कारण, जो जो होगा वह आपको वही समझेगा न! मुझे कुछ कहने पर मुझे अपने में वह दिखे या न, हो, दिखे या न, पर उसके कहने पर उसके भीतर जो वह होता है मुझे वह ज़रूर दिख जाता है। और तब मन को बड़ी तसल्ली होती है कि यार! आज तक जिसे तू जो समझता रहा, वह तो वह था ही नहीं। वह तो कुछ और ही था। थैंक गॉड! देर से ही सही, जो वह था उसने अपने आपको वह आख़िर बता ही दिया। वर्ना वह असल में क्या है, यह जानने के लिए मुझे बेकार में पता नहीं कितने दिन और इंतज़ार करना पड़ता।

कल बड़े दिनों बाद शुद्ध गधा दिखा। मैंने तो मान लिया था कि अब शुद्ध गधे समाज से ईमानदारों की तरह ख़त्म हो चुके हैं। मित्रो! हमारे मान लेने से समाज से कुछ भी ख़त्म नहीं हो जाता। असभ्य ख़त्म नहीं हो जाते। लालच के द्रव्य ख़त्म नहीं हो जाते।

गधा बहुत उदास था। सच्ची को! इतना तो विकट से विकटतम परिस्थितियों में कभी मैं भी नहीं हुआ। स्मार्ट नहीं, ओवरस्मार्ट इन्सान होने के नाते उसके दुःख में क़ायदे से शरीक होने के बाद मैंने उससे पूछा, “क्यों भाई गधे! इतने उदास क्यों? देखते नहीं, जीडीपी कहा से कहा पहुँच गई है? यह उदास होने के दिन नहीं, जश्न मनाने के दिन हैं। सरकारी दुकान से आटा ले मालपुए खाने के दिन हैं।”

“और रुपए की क़ीमत?” ओ भाई साहब! जिस देश में शुद्ध गधे भी मुँह खोलने लग जाएँ, उस देश को ज्ञानी होने से कोई नहीं बचा सकता।

होते रहें तो होते रहें साक्षरों को निरक्षर बनाने के प्राजेक्टों में घोटाले। घोटाले यहाँ कहाँ नहीं! एक सनसनी लबरेज़ चैनल ने तो दावा किया है कि अब स्वर्ग में घोटाले होने लगे हैं। वह जल्द ही इसका लाइव प्रसारण कर पर्दाफ़ाश करेगा। मित्रो! पर्देफ़ाश वहाँ हुआ करते हैं, जहाँ पर्दे हों। जहाँ पर्दे ही नहीं, वहाँ क्या ख़ाक पर्देफ़ाश होंगे?

सच कहूँ तो अब घोटाले की जाँच करने वाले घोटाले में भी घोटाले हैं। चलो, घोटाले हैं तो जीवन है। चलो, घोटाले हैं तो अपनापन है। चलो, घोटाले हैं तो जीवन में प्रवाह है। ये घोटाले ही हैं जो हमें एक दूसरे से जोड़े रखते हैं। घोटाले बंद होने होंगे तो नहीं, पर मान लीजिए! मान लेने में कुछ नहीं जाता। न मेरा, न आपका। कौन सा सच्ची को हो जाएगा जो हम मान रहे हैं। तो कल को जो घोटाले होने बंद हो जाएँ तो सज्जन तो सज्जन, सज्जनों के साए तक एक दूसरे से साए चुराने लग जाएँ। इन घोटालों की वजह से ही तो हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

“छोड़ो सखा परे ये जीडीपी, जुडीपी। ये सब आँकड़ों का खेल है। जैसे मन किया, वैसे घुमा दिया,” मैंने माफ़ी की मुद्रा में सिर नीचा करते कहा, पता नहीं किसकी ओर से। फिर सोचा, हे दाँव के हिंदी प्रेमी! आँकड़े शब्द अनायास कह तो दिया, पर पता नहीं, बड़े-बड़े माननीयों, सम्मानीयों की तरह गधा शुद्ध हिंदी समझेगा भी?

असल में इन दिनों मेरे इर्द-गिर्द हिंदी सप्ताह का आभामंडल तैर रहा है। हिंदी के भिक्षार्थियों को उनके पेट पर अपना हाथ फेर खिलाया जा रहा है। वर्ना हिंदी के भिक्षार्थियों की क्या मजाल कि शेष दिन वे अपने पेट पर अपना हाथ फेरने के लायक़ भी हों। बस, औरों के भर पेट देख डकार लेते रहते हैं, फोके। मतलब, अब शुद्ध गधे भी शुद्ध गधे नहीं रहे? शेष तो ख़ैर अब बाज़ार में कुछ शुद्ध बचा ही नहीं है। सड़क से संसद तक केवल शुद्धता के लेबल ही हर माथे पर चिपके हुए हैं। जो ग़लती से चिपकाया लेबल कहीं उखड़ जाए तो लाख कोशिशों के बाद भी पता ही न चले कि बंदा है तो है, पर आख़िर किस ब्रांड का है।

समझदार आदमी को रिस्पेक्ट मिले या न, पर मेरे हिसाब से हर गधे को रिस्पेक्ट ज़रूर मिलनी चाहिए। और जो शुद्ध हो ख़ासकर उसे तो कि उसने हर चीज़ के नक़ली के दौर में अपनी शुद्धता को आज भी नक़लियों के बीच जैसे-कैसे बचाकर रखा है, सो उससे रिस्पेक्टफ़ुली कहा, “देखो गधे जी! अपने को केवल गधा समझ सबकी मिट्टी पलीत मत करो। तुम मात्र गधे नहीं हो! देश की संस्कृति के वाहक हो, राजनीति के ग्राहक हो, संवाहक हो। तुम गुणों वाले नहीं, बेहद गुणों से भरपूर सामाजिक जीव हो। सामाजिक प्राणी वे होते हैं जो समाज के प्राण खाते हैं। क्या तुम्हें पता नहीं कि मिस्र की महारानी अपनी बेदाग़ ख़ूबसूरत त्वचा बनाएँ रखने के लिए रोज़ तुम्हारी प्रेमिका के दूध से नहाया करती थीं। कई तो जवान बने रहने की चाह रखने वाले बूढ़े हो चुके आज भी तुम्हारी प्रेमिका के दूध का सेवन करते रहते हैं, खाँसते खंसते। उनके लिए गाय का नहीं, गधी का दूध अमृत है।

“आगे सुनो! कई सरकारों ने तो व्यवस्था में गधों की महत्ता को जानते हुए डंकी फार्म तक जनता के पैसों से खोलने शुरू कर दिए हैं। उनको पता है कि शुद्ध गधे ही कुर्सियों की सबसे बड़ी ताक़त, शराफ़त होते हैं। नक़ली गधे तो खा पीकर दूसरी लाइन में खड़े हो जाते हैं।

“इतना ही नहीं, और भी आगे सुनो! अब तो मेरी सरकार तक गधा पालन के लिए उल्लू पालन की तरह, सूअर पालन की तरह, गिरगिट पालन की तरह सब्सिडी दे रही है। भले ही गधा पालने वाले गधा पालन को मिली राशि में से सब्सिडी ख़ाकर दूसरे पालन की सब्सिडी खाने को लाइन में लगते रहे हों। इसलिए गधे होने पर उदास मत हो डियर!! गधा होना सम्मान की बात है। चलो, शान से सिर ऊँचा करो हर मंच से कहो, अहम् वैशाखनंदनः! अहम् पवित्रम् वैशाखनंदनम्!” मेरे उकसाने पर वह इतना हवा में चला गया कि मेरे गले ऐसा लगा, ऐसा लगा कि आज तक इतने प्यार से मेरे गले मेरे अपने भी शायद ही लगे होंगे। 

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