बायोलॉजिकल नॉन बायोलॉजिकल और मैं
डॉ. अशोक गौतम
बंधुओ! मेरा बायोलॉजी नॉन बायोलॉजी से दूर-दूर तक का स्कूल टाइम से ही कोई रिश्ता नहीं, कोई नाता नहीं। अपने माँ-बाप की बायोलॉजिकल औलाद होने के बाद भी मुझे बायोलॉजी से स्कूल टाइम से ही बहुत डर लगता था। इसलिए मैंने बायोलॉजी की किताब की ओर आँखें बंद किए भी नहीं देखा। कभी उसे कहने को भी नहीं छुआ।
असल में मेरे स्कूल में बायोलॉजी के सर बायोलॉजिकल नहीं, इबायोलॉजिकल थे। वे हर चीज़ में लॉजिक नहीं, इलॉजिक ढूँढ़ते थे। उनका मानना था कि इलॉजिक ही लॉजिक की जननी है। जो इलॉजिकल नहीं होगा, वह लॉजिकल भी होगा। भले ही वह अपने को लॉजिकल बताने के कितने ही लॉजिक क्यों न दे।
जब स्कूल भेजा गया तो कुछ न कुछ तो पढ़ना ही था। आज की तरह उस समय की स्कूलिंग में लव सबसे कंपलसरी सब्जेक्ट नहीं होता था। इसलिए मैंने आर्ट्स पढ़ा यह सोचकर कि ज़िन्दगी में और कुछ सीख पाऊँ या न, पर कम से ज़िन्दगी में हँसते हुए सबसे जूते खाने की कला तो सीख जाऊँगा, पर ये बात दूसरी है कि जब भी मैंने जीवन को कलात्मक बनाने की कोशिश की मेरे जीवन को अकलात्मक बनाने के लिए धरती के तो धरती के, स्वर्ग के फ़रिश्तों ने भी कोई कसर न छोड़ी।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह दोस्त भी दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह साहित्यकार भी दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह सम्मान प्राप्त करने वाले भी दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह साहित्य भी दो तरह का होता है, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह चमचे भी दो तरह के होते रहे हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल। लेकिन कालांतर में चमचागीरी के तेज़ी से बदलते रूप स्वरूप को बदलती ज़रूरतों के बेहिसाब में ढालते-ढालते इसके कई घराने, उपघराने होते चले गए। पहले तो किसीकी चमचागीरी के तौर तरीक़े को देखकर पहली नज़र पता लग जाता था कि अमुक चमचा चमचागीरी के किस घराने से है, पर जबसे हर चमचे ने अपना घराना-तराना बनाना शुरू कर दिया है तबसे उसके मूल चमचागत घराने का पता लगाना कठिन हो गया है।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह नेता भी अब दो तरह के हो चले हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह धर्म भी दो तरह का होता है, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल। जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह धर्म ध्वजा धावक भी दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह रिश्ते भी दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल। लेकिन आजकल हर रिश्ते ने अपने को नॉन बायोलॉजिकल कहाना शुरू कर दिया है। वैसे किसी से बायोलॉजिकल रिश्ता बनाने बताने में वह आनंद कहाँ जो नॉन बायलॉजिकल रिश्ता बताने बनाने में हैं।
जिस तरह जीव दो तरह के होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल, उसी तरह बेशर्म भी दो तरह का होते हैं, बायोलॉजिकल और नॉन बायोलॉजिकल।
नॉन बायोलॉजिकल बेशर्म बायोलॉजिकल बेशर्मों से अधिक मोटी चमड़ी के होते हैं। वे किसीसे बेशर्मी करते हुए बराबर देखते रहते हैं कि जिससे वे हँसते-मुस्कुराते बेशर्मी कम बदतमीज़ी कर रहे हैं, उसका उनकी बेशर्मी सहन करने का स्तर कितना है। वह उनकी बेशर्मी सहन करने की कितनी डोज़ मज़े से ले सकता है।
बायोलॉजिकल बेशर्मों की अपेक्षा नॉन बायोलॉजिकल बेशर्म अधिक ख़तरनाक होते हैं। वे रेशम के कपड़े में अपनी बेशर्मी छुपा इस ढंग से बेशर्मी करते हैं कि किसीको पता ही नहीं चलता कि वे बेशर्मी कर रहे हैं या सम्मान दे रहे हैं। नॉन बायोलॉकिजल टाइप के बेशर्म बेशर्मी भी करते रहते हैं और मंद-मंद मुस्कुराते भी रहते हैं। फाइनली उनकी की बेशर्मी का पता तब चलता है जब अपने साथ हुई बेशर्मी के रूझान चुनाव के नतीजों की तरह बेशर्मी के बाद धीरे-धीरे आने लगते हैं।
बायोलॉजिकल बेशर्म नॉन बायोलॉजिकल बेशर्मों की अपेक्षा फिर भी किसी के साथ बेशर्मी कुछ रहम के साथ करते हैं। वे किसीके साथ बेशर्मी करने से पहले बेशर्मी की सीमा तय कर लेते हैं। उन्हें बेशर्मी करते कभी कभी थोड़ी बहुत शर्म सी आ जाती है। पर ये दूसरी बात है कि वे भी बेशर्मी करते हुए कभी-कभार छोटे–बड़े का लिहाज़ सा कर लेते हैं, कारण वे नॉन बायोलॉजिकल बेशर्म नहीं होते। लेकिन नॉन बायोलॉजिकल बेशर्म लिहाज़ से ऊपर उठा होता है, बहुत ऊपर! भगवान से भी ऊपर!
ये जो नॉन बायोलॉजिकल टाइप के महानुभाव बेशर्म होते हैं न, जब तक ये किसीके साथ बेशर्म प्रूफ़ बेशर्मी न कर लें, इन्हें न खाया खाना भी नहीं पचता, भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती। इन पुण्यात्माओं को खाना तो तब पचे, प्यास तो तब लगे जो किसीके साथ बेशर्मी करने से पहले ये कुछ पिएँ खाएँ।
ये जो नॉन बायोलॉजिकल टाइप के महानुभाव बेशर्म होते हैं, जब तक ये किसीके साथ बेशर्म प्रूफ़ बेशर्मी न कर लें, उनकी आत्मा को तब तक शान्ति नहीं मिलती। इनकी आत्मा को शान्ति तो तब मिले जो किसीके साथ बेशर्मी करने से पहले ये शांत रहे। ऐसे में जब इनको बेशर्मी करने को कोई नहीं मिलता तो ये अपनी बेशर्मी की पिपासा शांत करने के लिए अपने से बेशर्मी कर अपनी बेशर्मी की पिपासा शांत करने का सफल प्रयास कर भी जश्नो जश्न मना लेते हैं।
जिस तरह मैं चारों ओर से पर्यावरण से घिरा हूँ उसी तरह नॉन बायोलॉजिकल बायोलॉजिकल बेशर्मों से घिरा हूँ। जैसे इनके बिना मेरा गुज़ारा नहीं, उसी तरह इनका मेरे बिना गुज़ारा नहीं। जिस तरह जब तक ये मेरे साथ बेशर्मी न कर लें जब तक इन्हें चैन नहीं आता, उसी तरह जब तक मैं इनकी बेशर्मी मन मसोस कर सहन न कर लूँ, तब तक मुझे भी चैन नहीं आता। जिस तरह ये अपने कर कमलों से किसीकी बेइज़्ज़ती करने को उसका पलकें बिछाए इंतज़ार करते रहते हैं, उसी तरह पता नहीं इनसे कोसों दूर रहने की क़सम खाने के बावजूद भी मैं क्यों पलकें बिछाए इनका इंतज़ार करता रहता हूँ? पता नहीं क्यों मुझ बदतमीज़ को भी तब तक खाना हज़म नहीं होता जब तक मैं इन भद्र्पुरुषों से अपनी इज़्ज़त के कपड़े उतरवा धन्य नहीं हो लेता।
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