कूल प्रभु कूल
डॉ. अशोक गौतम
मैं पराँठों और डाँटों का बहुत शौक़ीन हूँ। जब तक बीवी से डाँट न मिले, जीने का मज़ा ही नहीं आता। इसी तरह मुझे चाहे छप्पन भोग खिला दीजिए, पर जब तक मुँह में आधा-पौन पराँठा न जाए, लगता है जैसे कुछ खाया ही नहीं।
मित्रो! पनीर के पराँठे खाने के अपने दिन तो गए। पनीर के पराँठे तब खाया करता था, जब सौ रुपए किलो पनीर आया करता था। अब तो आलू के पराँठे भी मिलते रहें, तो उन्हें ही पनीर के पराँठे समझकर खाता रहूँ। कहीं कल को जो आलू भी महँगे हो गए, तो . . .
मेरी फ़रमाइश थी कि संडे को आलू के पराँठे हर हाल में बनने चाहिएँ। पर घर में आलू ख़त्म थे। इसलिए बीवी ने बाज़ार से आलू लाने के आदेश जारी किए, और मैं उसके आदेशों को सिर-माथे लेकर जा पहुँचा बाज़ार में।
यह जानते हुए भी कि आलू की बोरी इधर-उधर उलटते-पलटते साफ़-सुथरे आलू ढूँढ़ रहा हूँ—जिस तरह किसी भी राजनीतिक पार्टी में लाख ढूँढ़ने के बाद भी कोई साफ़-सुथरा नेता नहीं मिलता, उसी तरह किसी भी आलू की बोरी को उलट-पलट कर देख लीजिए, साफ़-सुथरा आलू मिलना कठिन होता है। कोई अंदर से ख़राब, तो कोई बाहर से; और कोई तो अंदर-बाहर दोनों ही ओर से।
लेकिन फिर भी साफ़-सुथरे आलू ढूँढ़ता, आलू की बोरी में मुँह घुसाए जुटा था कि पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। तो मैं आलू छाँटना बंद कर पीछे मुड़ा। पीछे मुड़कर देखा तो—प्रभु! मेरे कम, उनके ज़्यादा। जो सत्ता का सबसे अधिक दोहन करते हैं, सत्ता के वे ख़ास होते हैं। शेष फ़्री के आटे-चावल वाले मेरी तरह के।
मेरे पीछे मुड़ते ही वे बोले, “बहुत परेशान हूँ बंधु! कुछ करो!”
वैसे वे न भी कहते, तो भी उनका चेहरा साफ़ बता रहा था कि वे परेशान हैं। तब मैंने उनकी परेशानी कम करने के इरादे से कहा, “परेशान यहाँ कौन नहीं, प्रभु! सच पूछो तो सब परेशान चल रहे हैं। देव से लेकर दानव तक, मानव से लेकर महामानव तक—सब। बंदा डाल-डाल तो परेशानी पात-पात। कहीं आदमी मोहल्ले के कुत्तों से परेशान चल रहा है, तो कहीं मोहल्ले के कुत्ते आदमियों से परेशान चल रहे हैं। कहीं कोई बीवी से परेशान चल रहा है, तो कहीं कोई बेबी से। कहीं कोई साहब से परेशान है, तो किसी से साहब परेशान है। जीव-जगत का मूल माया नहीं, परेशानी है। पर तुम सबकी परेशानी हरने वाले परेशान क्यों? जिस धर्म में प्रभु भी परेशान होने लग जाएँ, तो समझ लीजिएगा, वहाँ प्रभु का पद संकट में है। भक्तों का क्या! वे तो धंधे के लिए दूसरा प्रभु बना लेंगे। भक्तों को कहाँ एक ही प्रभु से काम! अच्छा, तो तुम परेशान क्यों हो?”
“मेरे चढ़ावे की चोरी हो रही है,” कहकर वे हताश हुए, तो मैंने उनसे कहा, “प्रभु! सब कुछ होइए, पर हताश-निराश मत होइए। होइए तो दिखिए मत। वर्ना कल को चारों ओर से हताश-निराश जनता आपके पास आना छोड़ देगी। वैसे चढ़ावे की चोरी कोई नई बात नहीं है। यह तो हर युग में होती आई है। चोरी तो यहाँ सब जगह हो रही है। जहाँ चोरी करने के ज़रा भी स्कोप नहीं, वहाँ भी चोरी करने को आदरणीय पंजीकृत संभ्रांत बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाए फिर रहे हैं। इसलिए इनसे अपने ऐंटिक शस्त्र संभालकर रखना, प्रभु! कल को कहीं ऐसा न हो, वे उन्हें भी विदेशी बाज़ार में बेचकर तुम्हारे हाथ में नक़ली शस्त्र थमा दें। चढ़ावा-चोर तो हर प्रभु की बग़ल में बैठे होते हैं, प्रभु! प्रभु की बग़ल में बैठकर ही अपने क़द को तुम्हारे ऊँचा किया जा सकता है। चोरों की बग़ल में चोर क्या ख़ाक बैठेंगे? यह सदियों से होता रहा है। युगों से होता रहा है। ऐसे में मेरे पास क्यों आए हो? पुलिस स्टेशन जाओ, शिकायत दर्ज कराने। यहाँ अपने ही पंगे कम नहीं। ऊपर से अब . . .”
“डर लगता है कि जो वहाँ मैं अपने चढ़ावे की चोरी की शिकायत दर्ज कराने गया, और उन्होंने मुझे ही उलटा चोर घोषित कर दिया, तो?”
जब प्रभु ने यह कहा, तो उन पर बहुत दया आई। सोचा न था, धर्मक्षेत्र में प्रभु के कभी इतने बुरे हाल होंगे।
“तो उनके ख़िलाफ़ शस्त्र उठा लो—‘यदा यदा हि धर्मस्य’ कहते-कहते,” मैंने उन्हें दूसरी राय दी, तो वे बोले, “पर वे मेरे अपने हैं।”
“महाभारत में भी तो अर्जुन ने विवश होकर अपनों के विरुद्ध शस्त्र उठाए थे।”
“वह महाभारत था, भारत नहीं।”
जब मैं उनकी विवशता जान गया, तो मैंने आगे उनसे पूछा, “अच्छा! तो एक बात बताना, प्रभु! वे परम भक्त किसके हैं?”
“मेरे,” कहकर उन्होंने अपना सिर नीचा कर लिया। जिसके ऐसे भक्त हों, उस प्रभु को सिर नीचा रखना ही पड़ता है।
“उन्होंने चढ़ावे की चोरी की, तो उनकी कोई न कोई मजबूरी तो रही ही होगी। बिन मजबूरी के गधे से गधा भी प्रभु से धोखा नहीं कर सकता। तुम्हें अपने चढ़ावे की ज़रूरत है?”
“नहीं।”
“तो तुम चढ़ावे की चोरी को लेकर इतने उग्र क्यों? वे कल भी उनके थे, आज भी उनके हैं, और आने वाले कल भी उन्हीं के होंगे। तुम उनको बस अपनी बग़ल में बिठाए रखो, अपना मन बहलाने को। कल को जो वे तुम्हारे पास से उठकर चले गए, तो अकेले दूसरे ही दिन अवसाद से घिर जाओगे। फिर खाते रहना दिन में दस-दस बार अवसाद की सैंपल फेल गोलियाँ। अच्छा, एक बात बताओ—तुम्हारे कोई साली है?”
“नहीं!”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई साला है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई सलहज है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई चाचा है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई भतीजा है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई सास-ससुर है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हारे कोई मामी-मामा है?”
“नहीं।”
“पर उनके तो है। तुम्हें झूठी शान-ओ-शौकत की बीमारी है?”
“नहीं।”
“पर उनको तो है। तुम कहीं आते-जाते हो?”
“नहीं। सारा दिन मंदिर में ही खड़ा रहता हूँ।”
“पर वे तो जाते हैं। तुम्हारे भक्त हैं—बस में जाने से तो रहे। तुम्हें भूख लगती है?”
“नहीं।”
“पर उनको तो बहुत लगती है। उनके पास एक पेट नहीं, पेट ही पेट हैं। तुम्हारी कोई इच्छा है?”
“नहीं।”
“पर उनकी तो इच्छाएँ ही इच्छाएँ हैं। तुम्हारी बीवी तुम्हें कभी तंग करती है?”
“नहीं।”
“पर उनकी तो उनको हरदम करती है कि ‘अब मुझे ये लाओ, अब मुझे वो लाओ।’ अब ऐसे में भक्त चढ़ावे पर हाथ साफ़ न करे, तो कहाँ करे?”
“तो?”
“तो क्या! जब किसी के साथ रहने की मजबूरी हो, तो वहाँ उनकी बहुत सी बदतमीज़ियों को इग्नोर करने में ही भलाई होती है, प्रभु! सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी गठित कर दी है। देखते हैं, वह तुम्हारे हक़ में क्या फ़ैसला देती है।”
“मतलब तब तक वेट एंड वॉच? बाद में देखते हैं, जाँच किस करवट बैठती है।”
“और उसके बाद?”
“उसके बाद आपको क्या करना है, अपने भक्तों से ही पूछ लेना, प्रभु! पर मेरी यही सलाह है कि भक्तों की हरकतों की ओर से जितने ‘फूल’ रहोगे, उतने ही लाइफ़ में कूल रहोगे।”
मैंने उन्हें दुनियादारी वाली सही सलाह दी और सड़े आलुओं की बोरी में साँस बंद कर, नाक घुसाकर साफ़-सुथरे आलू ढूँढ़ने में मग्न हो गया। सवाल पराँठों का जो था।
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