सड़क गुण गड्ढ गुणी अनन्ता
डॉ. अशोक गौतम
बंधुओ! आम आदमी के सिर पर कुछ और हो या न, पर शिकायतों की वैसी ही भारी भरकम गठरी होती है जैसी अविवाहित प्रेमियों के दिल पर पास शिकवों की। प्रेमी की आयु सीमा से मैं बहुत पहले गुज़र चुका हूँ। इसलिए अब मेरे पास केवल और केवल शिकायतों की गठरी है। अगर आप भी मेरी तरह के आम आदमी होंगे तो तय मानिए, आपके पास भी शिकायतों का मेरी तरह का ही अंबार होगा। ये अलग बात हो सकती है कि आप उन्हें अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा मान अब चुप रहने लग गए होंगे।
आम आदमी किसी और चीज़ का बोझ उठाए यहाँ-वहाँ फिरे न फिरे, वह शिकायतों की गठरी यहाँ-वहाँ, इस उस विभाग उठाए ज़रूर देखा जा सकता है। जिस किसीके सिर पर भी उसके भार से भारी बोझ की गठरी आपको दिखे, उसके बारे में दूसरी और कोई राय बनाने में क़तई देर मत कीजिए, आखें मूँद फ़ाइनल कर लीजिए कि वह एक तो आम आदमी है और दूसरे उसने अपने सिर पर जो गठरी उठायी है, वह पारिवारिक, व्यवस्थागत शिकायतों की गठरी के सिवाय और कुछ नहीं।
आम आदमी को बीवी से शिकायत होती है। आम आदमी को बच्चों से शिकायत होती है। आम आदमी को यार दोस्तों से शिकायत होती है। आम आदमी को अपने से शिकायत होती है। और कई बार तो उसे भगवान से भी शिकायत हो जाती है। आम आदमी को हर मौसम से शिकायत होती है। आम आदमी को हर सिम से शिकायत होती है।
आम आदमी होने के नाते आम आदमी सिर पर शिकायतों की गठरी उठाए कभी इस विभाग भटकता है तो कभी उस विभाग। पर एक उसकी शिकायतें होती हैं कि कम होने का नाम नहीं लेतीं। उन्हें सुनते तो सब हैं, पर उनका निवारण किसीके हाथ नहीं हो तो तब जो उसकी शिकायतों का निवारण करने वालों हाथों के पास हाथ हों। उत्तरोतर उसके सिर पर उठी शिकायतों की गठरी भारी होती जाती है।
इधर मानसून आया, शिकायतीले आम आदमी को मानसून से भी शिकायत हुई तो उसने मानसून के सामने सिर पर दूसरी शिकायतों की गठरी उठाए उठाए उसके सामने शिकायत का सवाल खड़ा करते कहा, “हे मानसून! एक बात बताओ! आख़िर तुम आते ही क्यों हों?”
“क्यों आने का मतलब? क्या हो गया! वैसे माफ़ करना! मैं आम आदमी के लिए बिल्कुल आता भी नहीं। ऐसे में वह ग़लती से जो मुझे अपने लिए आया मान ले तो ग़लती उसकी।
“डियर! मैं तो सरकारी विभागों के लिए आता हूँ। तुम मेरी क़द्र क्या जानो! मैं उनके लिए आता हूँ जो मेरा मान करते हैं, सम्मान करते हैं। जो मेरे जाने के बाद से ही मेरे आने की बेसब्री से बाट जोहते रहते हैं। जो मेरे इंतज़ार में साल भर सोए-सोए भी पलकें बिछाए रहते हैं।
"सच कहूँ तो मैं किसानों का कल्याण करने भी नहीं आता। असल में मैं आपदा विभाग वालों का कल्याण करने आता हूँ। मैं लोक निर्माण विभाग वालों का कल्याण करने आता हूँ। तुम्हारे लिए तो सरकारी राशन की दुकान पर आटा दाल ही समय पर आ जाए वही बहुत है। हे आम आदमी! तुम क्या जानो मानसून का महत्त्व!” मानूसन ने सीना चौड़ा कर कहा तो आम आदमी टूटे छाते के नीचे भीगने से शिकायतों की गठरी छिपाते बोला, “यार! सड़कों के गड्ढे दो दिन पहले ही भरे गए थे कि तुम आ गए? लगता है आम आदमी की टाँगों की क़िस्मत में बारह महीने बावन सप्ताह गड्ढों में ही चला गिरना लिखा है।”
“देखो आम आदमी! हर जगह शिकायत करने से पहले किसी चीज़ की तकनीकी स्तर पर जाँच कर उसके अप्रत्याशित लाभों के बारे में भी सोच लिया करो। माना, तुम जन्म से ही निगेटिव हो, पर व्यवस्था के प्रति हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण मत रखो। एक बात बताऊँ? पता है मेरी मेहनत से सड़क में पड़ते गड्ढों से कितने लाभ होते हैं? रे पामर! तुम क्या जानो गड्ढों के गुण!”
“मतलब!” लो साहब! अब मानसून से सुनिए सड़क पर पड़ते गड्ढों के लाभ! अब मानसून से सुनिए सड़क पर पड़ते अवगुणी गड्ढों के गुण! आम आदमी कुछ आगे कहने पूछने के बदले मानूसन का मुँह एकटक निहारता रहा तो मानूसन अपना छाता बंद करता बोला, “सड़क में मेरे द्वारा डाले गड्ढों का सबसे बड़ा पहला लाभ यह होता है कि लोग-बाग सँभल सँभल कर चलते हैं। पता है ऐसा होने से क्या होता है?”
“क्या!” आम आदमी एक बार फिर अवाक्!
“ऐसा होने से वाहन की स्पीड कंट्रोल में रहती है। आदमी की स्पीड कंट्रोल में रहती है। तब दुर्घटना होने की सम्भावना बिल्कुल कम हो जाती है। दुर्घटना होने की सम्भावना कम होने पर आदमी अस्पताल के चक्कर लगाने से छूट जाता है। जब वह अस्पताल के चक्कर लगाने से छूट जाता है तो उसका बेकार की दवाइयों पर का ख़र्चा बच जाता है। तब उसे गाड़ी, अपने हुए नुक़्सान के क्लेम के लिए बीमा कंपनियों के चक्कर लगाने में अपना क़ीमती समय बरबाद नहीं करना पड़ता। जब मेरे आने पर मिट्टी से भरे गड्ढों वाली सड़कों पर और गड्ढे पड़ते हैं और जब उनमें पानी भरता है तो महल्ले के बच्चों को उनमें स्वीमिंग पूल की फ़ील आती है। तब वे उनमें तैरते स्वीमिंग किसी शाही पूल का सुख प्राप्त करते हैं। वर्ना बेचारे वे कहाँ जा पाएँगे पेड स्वीमिंग पूल में तैरने। मैं सड़क में गड्ढे डालता हूँ तो बच्चे उनमें काग़ज़ की नौका बना उनमें नौका विहार कर फ़्री में गोवा का सुख प्राप्त करते हैं। इसमें बुरा क्या है? जब जनता गड्ढे! गड्ढे! चिल्लाती है तो जनता के प्रिय नेताओं को अपने अगल-बग़ल चले अपने अधिकारियों का जनता से परिचय करवाने का सुअवसर मिलता है। जनता को मेरे आने पर ही पता चलता है कि उनके इलाक़े का किस विभाग का अधिकारी कौन है। मात्र एक मैं ही ऐसा मौसम हूँ जिसमें नेता और उनके अधिकारी जनता से मिलने के लिए सहर्ष ऑफ़िसों से बाहर आते हैं। शेष मौसम तो वे अपने ऑफ़िसों में ही दुबके रहते हैं। कभी ऐसी के नीचे तो कभी हीटर के सामने।
एक और पते की बात बताऊँ? तुम्हें शायद पता हो कि न हो। जिनकी हिली हड्डियाँ बड़े से बड़े डॉक्टर नहीं बैठा पाते उनकी हिली हड्डियाँ मैं अपने द्वारा बनाए गड्ढों में क़दम पड़ते ही बैठा देता हूँ। तब उनके लिए मेरे द्वारा बनाए गड्ढे गड्ढे, नहीं सफल इलाज होता है।
मैं सड़क में गड्ढे डालता हूँ तो पता है मैं क्रेडिटरों तो क्रेडिटरों, डिफ़ाल्टरों को भी कितना काम देता हूँ? कितने विभाग के कर्मचारियों को कमीशन के तौर पर इनाम देता हूँ? इसलिए हे आम आदमी! तुम क्या जानो सड़क में पड़े गड्ढों के पीछे के सुख! तुम्हें तो कवल अपने पेट की चिंता होती है। पर मैं ही जानता हूँ मुझे कितने पेटों की चिंता होती है! कभी दूसरों के लिए भी जीना सीखो तो बात बने, ” मानसून ने कहा और आम आदमी के सामने ही मुस्कुराता हुआ बरसाती किनारे फेंक सड़क में गड्ढे बनाने जुट गया।
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