एस्पिरिन एपस्टीन और ताज़े टटके भैया जी 

15-02-2026

एस्पिरिन एपस्टीन और ताज़े टटके भैया जी 

डॉ. अशोक गौतम (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

बँधुओ! वैसे तो मैं अभी नवाकुंरित जनसवेक हूँ। हिम्मत और दुस्साहस से जनसेवा के पथ पर पूरी तन्मयता से चलता रहा तो बहुत जल्दी बड़ा जनसवेक भी हो जाऊँगा। इतना बड़ा कि मुझे समाज कहीं नहीं दिखेगा। बस समाज को मैं ही दिखूँगा। 

सरकारी नौकरी में प्रमोशन के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ता है। एड़ी चोट का ज़ोर लगाना पड़ता है। पर जनसेवकाई में ऐसा कुछ नहीं। जो आलाकमान की नज़रों को अपने कारनामों से भा जाए तो साल में ही चार चार प्रमोशन पा गए। 

मित्रो! जनसेवक चाहे किसी भी कैटेगरी का हो। मूलतः वह होता जनसेवक ही है। जनसवेक की कैटेगरी मायने नहीं रखती। उसकी जनसेवा का मीटर मायने रखता है। 

वैसे तो जनसेवक जनता के बीच से ही होता है, जनता के बीच का ही होता है, पर जनता के बीच से का होने के बाद भी जनता और जनता के जनसवेक में बहुत बड़ी असमानता होती है, और वह यह कि उसके मार्ग दर्शन में जनता पीछे जाती रहती है, पर जनता की पीठ पर चढ़ वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है। जनता नीचे जाती रहती है, वह नित नई ऊँचाइयाँ छूता रहता है। नीचे जाना जनता का धर्म है, नीचे जाती जनता को ऊपर उठाने की कोशिश में निरंतर ऊपर उठते रहना जनसेवक का सद्कर्म है। 

जनसवेक किसीसे नहीं डरता। वह आपत्तियों से नहीं डरता। वह विपत्तियों से नहीं डरता। आपत्तियाँ जनता का भाग्य है। विपत्तियाँ जनता का सौभाग्य है। जनसेवक सबको डराता है। अगर वह सबको डराएगा नहीं तो जनसेवा में अपना सिक्का कैसे जमाएगा? 

जो जनसेवक जनसेवा की फ़ील्ड में डरे, समझ लीजिए वह जनसेवक जाली डिग्रीधारी है। जनसेवक के नाम पर कलंक है, असाध्य बीमारी है। 
पर पता नहीं आजकल मैं क्यों डरा-डरा सा हूँ? बाहर निकलने को मन नहीं करता। घर में रहा नहीं जाता। हालाँकि मैं जानता हूँ कि मैंने अभी तक उस लेवल के कोई कांड नहीं किए हैं जिनकी वजह से किसी फ़ाइल में मेरा नाम आए। अभी तो मेरा नाम मेरे महल्ले वालों की ज़ुबान पर भी नहीं। अभी तो मैं बस, अपने अग्रजों की फ़ाइलें उठाए उनके पदचिन्हों पर अपने पग रखता उनके पीछे-पीछे चलता हूँ। 

बँधुओ! कितने ही बड़े जनसेवक और कितनी ही महँगी गाड़ी के मालिक के पास कितने ही पीयूसी क्यों न हों, वे पर्यावरण और समाज की हवा को कहीं न कहीं से ख़राब करते ही करते हैं। जिस तरह हज़ार पीयूसी होने के बाद भी गाड़ी पर्यावरण को ख़राब किए बिना रह सकती उसी तरह बड़े से बड़ा चरित्र का डिग्रीधारी भी समाज को कलंकित किए बिना नहीं रह सकता। 

मित्रो! जनसेवक किसी भी कैटेगरी का हो, वह पूरा लीलाधारी मन तनरंजनी जीव होता है। मन तनरंजन उसकी नस-नस में प्रवाहित होता है। जन सेवाएँ उसकी लीलाएँ होती हैं। जो लीलाधारी मन तनरंजन प्रिय न हो वह जनरंजक प्रिय ही काहे का। 

जिस तरह जनता काम करते करते जब थक जाती है तो वह मनोरंजन के लिए सिनेमाघर जाती है। सिनेमाघर जाकर अपनी थकान मिटाती है। और सिनेमाघर में जाकर अपनी थकान मिटाने के बाद फिर से अपने काम में पहले से भी अधिक फ़ुर्ती से लग जाती है। उसी तरह जब जनसेवक जनता के काम करता-करता थक जाता है तो वह अपनी थकान मिटाने के लिए जहाँ उसका मन करे वहाँ चला जाता है। उसके पास हर जगह जाने का परमिट होता है। उसके पास हर क़िस्म के हमाम में नहाने का परमिट होता है। जनसेवक होना कुछ भी करने का सबसे बड़़ा परमिट होता है। जनता तो वह है नहीं कि जो अपनी थकान मिटाने सिनेमा घर जाएगा या ग़ैर मंजूरशुदा अहाते में जाएगा। उसकी अपनी सोसाइटी होती है, अपनी वैराइटी होती है। 

मित्रो! अभी मैं इतना क़ाबिल जनसेवक नहीं हुआ हूँ कि किसीको गोली दूँ ख़ुद। अभी तो मैं ख़ुद एस्पिरिन की गोली लेता हूँ, पर जबसे एपस्टीन नाम की फ़ाइल का नाम सुना है, पता नहीं क्यों मेरी भी घिग्धी बँध गई है। हो सकता है, निकट भविष्य में ये मेरे महान होने का संकेत हो। पर डर इस बात का है कि जो कल को कहीं ग़लती से डॉक्टर ने जल्दबाज़ी में मेरी दवा की पर्ची पर एस्पिरिन की जगह एपस्टीन लिख दिया तो? एस्पिरिन के एप्सटीन में बदलते कौन देर लगती है? इसलिए एस्पिरिन लेने के बाद भी मेरे हाथ पाँव सुन्न हो रहे हैं। दिल बैठा जा रहा है। ख़ैर, दिमाग़ तो मेरा पहले भी काम कम करता था, पर अब मेरा दिमाग़ बिल्कुल काम नहीं कर रहा है। वैसे दिमाग़ वाले बिन दिमाग़ वालों की चिलम भरने के लिए ही होते हैं। ऐसे में वे अपनी चिलम अपने आप भरने की क्यों ज़हमत उठाएँ। एक बात तो बताना हे पढ़े लिखो! ये फ़ाइलें आख़िर बनती ही क्यों हैं? बनती ही हैं तो खुलती क्यों हैं? क्या फ़ाइलों के बिना काम नहीं हो सकते? जब खुलती हैं तो पूरी जनसवेक बिरादरी को परेशान करके क्यों रख देती हैं? महान से महान को बेज़ुबान करके क्यों रख देती हैं? 

मानता हूँ प्रभु कि समाज सवेकों के शब्दकोश में डर, लज्जा, सहमना जैसे शब्द नहीं होते। फिर भी एस्पिरिन लेने वाले की एपस्टीन से रक्षा करना प्रभु! हवा में आँच का क्या! क्या पता किस ओर मुड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो एक होनहार जनसवेक समाज को रोशन करने से पहले ही बुझ जाएगा। 

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