पहली बार मज़े 

डॉ. अशोक गौतम

मुझे सामूहिक लाभों से कभी कोई सरोकार नहीं रहा। कारण, मैं सामाजिक प्राणी घोषित होने के बाद भी तथाकथित सामाजिक जानवर  ही हूँ और जन्म-जन्म तक सामाजिक जानवर ही रहूँगा। मेरे दिमाग को कोई चाहे कितना ही सौ प्रतिशत शुद्ध पॉलिश से कितना ही पॉलिश क्यों न कर ले। 

वैसे अपने समाज में अपने को कोई कितना ही समाज सेवी कह ले, पर देर-सबेर वह समाज की सेवा करते-करते अपनी सेवा में लीन हो ही जाता है। ये स्वार्थ का वायरस होता ही ऐसा है... गधा कहीं का!  निस्वार्थ के रथ पर सवार होकर स्वार्थ की अँधेरी गली की ओर कब आँखें मूँद मुड़ जाए पता ही नहीं चलता। कोरोना से भी ज़्यादा अज्ञात विश्वासघाती। स्वार्थ से बड़ा आत्मघाती कोई नहीं। ज्ञात विश्वासघातियों से तो जैसे-कैसे निपटा जा सकता है। उनसे निपटा नहीं जा सकता तो उनसे जैसे-कैसे बचा तो जा सकता है। पर अज्ञात स्वार्थ के नातियों के वायरस से लड़ना भी मुश्किल है और बचना तो मुश्किल है ही। मैंने समाज में ऐसे बहुत आँखों वाले देखे हैं जो अपने को स्वार्थ पर विजयी होने का दावा करते हैं। पर मौक़ा मिलते ही इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि...ज्यों जन्म-जन्म के सामाजिक अंधे हों।

मास्क हर चेहरे पर अति ज़रूरी होने के आदेश हुए तो भी मैंने सोचा, रोज़ बदलते मास्कों से तंग आ चुके, खुरच चुके मुँह पर एक और मास्क लगाने की ज़रूरत क्या ? मैं हफ़्ते में एकबार नहाने पर भी चड्डी बदलूँ या न, रोज़ तो चेहरे पर न दिखने वाले मास्क बदलता ही रहता हूँ। बिन मास्क वैसे समाज में जिया भी नहीं जा सकता। अगर मैं ग़लत होऊँ तो अपने वास्तविक चेहरे को लिए कोई भी किसीके सामने दो मिनट खड़ा होकर दिखाए। चेहरा शरीफ़ से शरीफ़ तक उसका असली थोबड़ा पल में बिगाड़ कर न रख दे तो पूछना।  

कल उन्होंने एक बार फिर गंभीर होकर कहीं बीमारी के साथ लड़ते तो कहीं बीमारों से लड़तों के बीच बताया कि चेहरे पर अब दिखने वाला मास्क लगना बहुत ज़रूरी हो गया है। दिखने वाला मास्क लगाने  का मत पूछो कितना फ़ायदा है? इसके रोग से लेकर भोग तक लाभ-लाभ हैं। अगर किसीसे उधार लिया हो तो ये मास्क अति का काम करता है। जिससे उधार लिया हो उसके मुँह के पास मिनटों खड़े रहो। क्या मजाल वह ज़रा सा भी पहचान जाए। बल्कि हो सकता है कि वह ख़ुद ही उससे अपना मुँह डर के मारे दूसरी ओर कर ले। 

हा रे महामारी! लोग आजकल बिन मास्क लगा चेहरा तो अशुभ मान ही रहे हैं पर मास्क लगे चेहरे से भी बहुत डरे हुए हैं। अब तो मंदिरों में भगवानों ने भी अपने मुँह पर मास्क लगा लिया है। जान प्यारी किसे नहीं होती भाई साहब! वे भगवान हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं हो जाता कि ऐरे ग़ैरे भक्त के मुँह पॉजिटिव हो जाएँ।  

जब उन्होंने पूरी मेहनत के बाद मेरे खुले दिखने वाले बंद दिमाग़ में मास्क लगाने के डायरेक्ट इन डायरेक्ट लाभ घुसाए तो मैंने मुँह के न दिखाई देने वाले मास्कों पर दिखाई देने वाला मास्क भी लगा लिया, यह सोचकर कि जहाँ मुँह पर इतने दूसरे मास्क हैं, उन पर एक और मास्क सही।   

पहली बार उनकी एडवाइज़री का पालन करते जैसे ही मैंने अपने मुँह पर दिखाई देने वाला मास्क लगाया, उसका तत्काल डायरेक्ट लाभ यह हुआ कि कल तक जो मैं झूठी हँसी सबके सामने हँसा करता था, उससे मुझे निजात मिल गई। जबसे मैंने मुँह पर ये दिखने वाला मास्क लगाया है, अपने सामने तक झूठ-मूठ को हँसना बिल्कुल बंद कर दिया है। औरों को तो छोड़िए, अब जब मुझे भी मेरी झूठी हँसी नहीं दिखती तो बेकार में क्यों हँसूँ? वर्ना दिखने वाला मास्क मुँह पर न लगा होने से पहले लोग थे कि मेरा मन न हँसने को होने के बाद भी मेरे होंठों पर हँसी देखने को बेचैन रहते थे। जब-जब मैं औरों को ख़ुश रखने के लिए झूठी हँसी हँसता था तो मत पूछो मुझे अपने पर कितना ग़ुस्सा आता था। अब जब मुँह दिखेगा ही नहीं तो बेकार में झूठ को हँसना भी क्यों? गधा तो मैं हूँ, पर इतना भी गधा नहीं कि बेकार में अपनी अनर्जी वेस्ट करता फिरूँ। 

मैं ही क्या, सच पूछो तो एक दूसरे के सामने एक दूसरे का मन रखने के लिए, एक दूसरे के सामने अपने को भीतर से निपट खोखला होने के बाद भी बाहर से भरापूरा बनाए, दिखाए रखने के लिए हम चौबीसों घंटे झूठी हँसी ही तो हँसते रहे हैं। न चाहते हुए भी हँसते रहते हैं। ताकि सामने वाले को लगे कि इसके पास हर चीज़ की कमी हो सकती है, पर झूठी हँसी की कोई कमी नहीं। 
वैसे शोऑफ़ के ज़माने में इतनी जीने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती जितनी दूसरों के सामने अपने को प्रसन्न दिखाने के लिए झूठी हँसी हँसने की जद्दोजेहद करनी पड़ती है। मुझसे बेहतर इस बात से वे जनाब वाकिफ़ होंगे जो घर से बाहर निकलते ही तभी हैं जब वे अपने मुँह पर की झूठी हँसी को नेचुरल लुक दे लेते हैं। 

वैसे असली कुछ आज हमारे पास है भी कहाँ? सब कुछ तो झूठा है। बातें झूठी, वादे झूठे, विश्वास झूठे, रिश्ते झूठे ... और यहाँ तक कि अपनी ज़िंदगी तक खोखली तो ऐसे में नक़्क़ालों के बीच नक़्क़ालों से सावधान होने रहने के बाद भी हमारे पास हँसी असली कैसे हो सकती है? तभी आज की तारीख़ में झूठ-मूठ को ठहाके लगाकर हँसने वालों की तादाद दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

दिखने वाला मास्क लगाने से पूर्व मेरे ईर्द-गिर्द झूठ-मूठ का हँसने वालों की जो दिन दुगनी रात चौगुनी तादाद कोरोना पॉज़िटिवों की तरह बढ़ रही थी, अब उसका पता नहीं चल रहा। अब डर है तो बस इसी बात का कि जो कल को कोरोना टेस्टों की तरह सच की हँसी हँसने का भी टेस्ट शुरू हो गया तो झूठ मूठ की हँसी हँसने वाले आधे मुँह के दर्शन भी दुर्लभ न हो जाएँ कहीं। 
मित्रो! अब जबसे उनके कहने पर मुँह पर दिखने वाला मास्क लगाया है, कोरोना से मुझे राहत मिलेगी, इस बात की गारंटी कोई वैसे ही नहीं दे सकता जैसे जीवन पर ओढ़े वफ़ादारों के काटने की कोई गारंटी नहीं दे सकता। पर पहली बार अब मैं मज़े में हूँ। वैसे वफ़ादार आदमी हो या कुत्ता, उसका पता ही नहीं चलता कि कब पीछे से काट जाए। जब मन से ख़ून बहने लगता है तभी पता चलता है कि अपना ख़ास हुआ तो काट गया यार!

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
विडियो
ऑडियो