स्थानीय नदी

01-06-2026

स्थानीय नदी

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ओ मेरी स्थानीय नदी 
तेरा न कोई भी नाम 
पर तू मेरी गंगा है
मेरी कविताओं को सींच रहा है 
तेरा बहता हुआ तरल 
तेरे उर से चिपट-चिपट जाते हैं 
मेरे प्यासे पक्षी 
तेरे जल से ही बनते हैं 
मेरे सारे बादल, जिनके 
सावन के आँगन में 
मैं कभी-कभार नाचता हूँ 
लोककथाओं वाले तेरे 
भँवर हमारे हृद में हैं 
जिनमें डूबा हूँ मैं आकंठ 
दिनों-दिन डूब रहा हूँ 
गहरे-गहरे! 

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