एक रात 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

रजनी रह-रह मुस्काती है 
नींद नहीं आती है 
 
स्वप्न कहाँ खोने को 
अश्रु नहीं रोने को 
पद चले गए 
पदचाप नहीं जाती है। 
 
तारों की शय्या
पर, नदी सो रही है 
बादल के रथ को 
हवा ढो रही है 
महामौन को तोड़ने के 
साधन बहुत हैं 
लेकिन रवि की किरण आख़िरी 
लौट नहीं पाती है! 

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