अँधेरे के प्रकाश में 

15-04-2026

अँधेरे के प्रकाश में 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

देखता हूँ आकाश 
काला 
कत्थई 
और 
भयानक आकाश! 
जो लील गया है 
न सिर्फ़ सूरज को 
बल्कि 
असंख्य तारों को भी 
जिसके अँधेरे में 
समा गए हैं 
सारे मार्ग 
उन मार्गों पर चलते 
सारे मनुष्य 
प्रारम्भ और अंतिम बिंदु के बीच 
केवल ठहरा है अँधेरा 
या शायद चल रहा है 
उल्टे पैर 
प्रारम्भ से अंत की ओर 
हवा के बेतरतीब झोंके 
अनेकानेक दिशाओं-कोणों से 
ठेल-ठेलकर 
उभार रहे हैं 
आत्मा का अंधापन 
दिशाओं की 
खोयी हुई स्मृति में 
भटक रही है 
केवल गड़गड़ाहट 
यकायक तेज़ गरज! 
एक क्षण को 
चमकती है बिजली 
खुलती है मानो 
कोई स्याह आँख 
तदोपरांत 
किसी राक्षस का 
भयंकर अट्टहास 
जड़ों की कँपकँपाहट 
और हवा के तमाचों से 
डरकर 
सरसरा रहे हैं पत्ते 
चौड़ी होती जा रही है 
कविता और मेरे बीच 
अँधेरे की खाई 
धूमिल होता जा रहा है 
चेतना का पुल 
उफनती हुई नदियाँ 
और बलबलाते नाले 
समेटते जा रहे हैं 
खेत दर खेत 
फ़सल दर फ़सल 
पानी की असंख्य धाराएँ 
खरोंचती जा रही हैं 
धरती की हरी देह 
मेंढकों और चमगादड़ों की 
अस्फुट लिपि में 
बड़बड़ा रहा है 
विराट अँधेरा! 

 

डरे हुए मकानों से 
शटर गिरी दुकानों से 
झाँकता है, चेहरेनुमा स्वप्न एक 
बाहर महाकोलाहल हाहाकार 
कोड़े पड़ रहे 
धरती के नंगे बदन पर 
कोटि-कोटि एक-एक बार में 
दिशाओं का सिरोच्छेदन बार-बार 
चू रहा है रक्त दाढ़ों से 
विशाल जानवर की 
भयानक देह 
रक्त से भीगी हुई 
दुबका हुआ हूँ 
मैं किसी गहन खोह में 
मौन पीता जा रहा हूँ ज़हर सा 
इस महाग्रंथ विस्तार में 
तद्भव-तत्सम संसार में 
देशज-विदेशी-योगरूढ़ 
तुम्हारी परंपरा हज़ार में 
नहीं है इस अँधेरे के लिए 
शब्द कोई 
सिवाय ‘अँधेरे' के! 
उसी जड़ मार्ग पर 
घिसते चप्पल 
पुराने, नए-नए और नए 
घोर झंझावात में 
सिगनल के लिए 
उसी दिशा में ताकती 
जंग खाती छतरी वही 
और छत अपने सर पर 
लादे हुए है 
काली-सफेद टंकी 
सिर पर जिसके हथोड़े सा 
चोट करता बार-बार 
गिर रहा पानी 
मेरे उपयोगितावाद का 
घुटने टेकती अंतिम किरण 
तिमिर का एकछत्र राज्य 
फूट गई है 
बल्ब की आँख 
पंखे का गला घुट गया है 
तकनीकी का आभासी चलचित्र 
भी शेष नहीं भागने के निमित्त 
गोल-गोल भँवर 
वात-चक्रवात 
सुनामी-भूकंप 
मेरा ही रूप धरे 
हज़ार-हज़ार 
डग भरते दानवाकार 
दबोच लेने को 
भूत से मंडरा रहे हैं 
जिस खोह में मैं छुपा हूँ 
भयभीत हो 
पत्थरों के घास-फूस नुमा रोयें पर 
देखता हूँ 
इस अँधेरे में भी 
और अँधेरी 
सघन अँधेरी 
छायानुमा अतिशय काली 
वक्ष-रीढ़-शीश हीन 
नृत्यलीन 
विचित्र आकृतियाँ 
दुष्ट आत्मसम्मोहन
टकराने लगे हैं 
मेरे अंदर दो विशाल पत्थर 
ओह! कर्णभेदी ध्वनि 
आह! कानों से रिसता हुआ ख़ून 
अरे! मेरी खोह में दलदल! 
दलदल, रक्तकीच! 
जकड़ता पैरों को
घसीटता, लसेटता 
घुटनों तक 
कमर तक 
वक्ष तक 
मेरी कीचसमाधि होगी 
अरे नहीं नहीं 
सिर तक 
अरे नहीं नहीं!

1 टिप्पणियाँ

  • 19 Apr, 2026 05:13 PM

    बहुत सुंदर रचना है. आपकी लेखनी मे एक rawness है. खूबसूरत नजरिया है आपका अभिषेक जी.

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