अँधेरे के प्रकाश में
अभिषेक पाण्डेय
देखता हूँ आकाश
काला
कत्थई
और
भयानक आकाश!
जो लील गया है
न सिर्फ़ सूरज को
बल्कि
असंख्य तारों को भी
जिसके अँधेरे में
समा गए हैं
सारे मार्ग
उन मार्गों पर चलते
सारे मनुष्य
प्रारम्भ और अंतिम बिंदु के बीच
केवल ठहरा है अँधेरा
या शायद चल रहा है
उल्टे पैर
प्रारम्भ से अंत की ओर
हवा के बेतरतीब झोंके
अनेकानेक दिशाओं-कोणों से
ठेल-ठेलकर
उभार रहे हैं
आत्मा का अंधापन
दिशाओं की
खोयी हुई स्मृति में
भटक रही है
केवल गड़गड़ाहट
यकायक तेज़ गरज!
एक क्षण को
चमकती है बिजली
खुलती है मानो
कोई स्याह आँख
तदोपरांत
किसी राक्षस का
भयंकर अट्टहास
जड़ों की कँपकँपाहट
और हवा के तमाचों से
डरकर
सरसरा रहे हैं पत्ते
चौड़ी होती जा रही है
कविता और मेरे बीच
अँधेरे की खाई
धूमिल होता जा रहा है
चेतना का पुल
उफनती हुई नदियाँ
और बलबलाते नाले
समेटते जा रहे हैं
खेत दर खेत
फ़सल दर फ़सल
पानी की असंख्य धाराएँ
खरोंचती जा रही हैं
धरती की हरी देह
मेंढकों और चमगादड़ों की
अस्फुट लिपि में
बड़बड़ा रहा है
विराट अँधेरा!
डरे हुए मकानों से
शटर गिरी दुकानों से
झाँकता है, चेहरेनुमा स्वप्न एक
बाहर महाकोलाहल हाहाकार
कोड़े पड़ रहे
धरती के नंगे बदन पर
कोटि-कोटि एक-एक बार में
दिशाओं का सिरोच्छेदन बार-बार
चू रहा है रक्त दाढ़ों से
विशाल जानवर की
भयानक देह
रक्त से भीगी हुई
दुबका हुआ हूँ
मैं किसी गहन खोह में
मौन पीता जा रहा हूँ ज़हर सा
इस महाग्रंथ विस्तार में
तद्भव-तत्सम संसार में
देशज-विदेशी-योगरूढ़
तुम्हारी परंपरा हज़ार में
नहीं है इस अँधेरे के लिए
शब्द कोई
सिवाय ‘अँधेरे' के!
उसी जड़ मार्ग पर
घिसते चप्पल
पुराने, नए-नए और नए
घोर झंझावात में
सिगनल के लिए
उसी दिशा में ताकती
जंग खाती छतरी वही
और छत अपने सर पर
लादे हुए है
काली-सफेद टंकी
सिर पर जिसके हथोड़े सा
चोट करता बार-बार
गिर रहा पानी
मेरे उपयोगितावाद का
घुटने टेकती अंतिम किरण
तिमिर का एकछत्र राज्य
फूट गई है
बल्ब की आँख
पंखे का गला घुट गया है
तकनीकी का आभासी चलचित्र
भी शेष नहीं भागने के निमित्त
गोल-गोल भँवर
वात-चक्रवात
सुनामी-भूकंप
मेरा ही रूप धरे
हज़ार-हज़ार
डग भरते दानवाकार
दबोच लेने को
भूत से मंडरा रहे हैं
जिस खोह में मैं छुपा हूँ
भयभीत हो
पत्थरों के घास-फूस नुमा रोयें पर
देखता हूँ
इस अँधेरे में भी
और अँधेरी
सघन अँधेरी
छायानुमा अतिशय काली
वक्ष-रीढ़-शीश हीन
नृत्यलीन
विचित्र आकृतियाँ
दुष्ट आत्मसम्मोहन
टकराने लगे हैं
मेरे अंदर दो विशाल पत्थर
ओह! कर्णभेदी ध्वनि
आह! कानों से रिसता हुआ ख़ून
अरे! मेरी खोह में दलदल!
दलदल, रक्तकीच!
जकड़ता पैरों को
घसीटता, लसेटता
घुटनों तक
कमर तक
वक्ष तक
मेरी कीचसमाधि होगी
अरे नहीं नहीं
सिर तक
अरे नहीं नहीं!
1 टिप्पणियाँ
-
19 Apr, 2026 05:13 PM
बहुत सुंदर रचना है. आपकी लेखनी मे एक rawness है. खूबसूरत नजरिया है आपका अभिषेक जी.
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- A Sunset
- अँधेरे के प्रकाश में
- अंतर्द्वंद्व
- अक्खड़ बाल
- अचानक कुछ कौंधा!
- अपनी भाषा
- अब आलिंगन न होगा . . .
- अब राह नहीं छोड़ूँगा
- अबूझी मंज़िल अनजानी राहें
- अस्त होना
- आ रही गहरी निशा है
- आओ विकास
- आकाश की दिशा
- आग न उठती हो जिसके अंतर में
- आत्मस्वीकार
- आहटें आती रहीं पर तुम न आई
- इंतज़ार कर, होगा सबेरा . . .
- ईश्वर
- उछलो!
- उतरो रे सूर्य गगन से . . .
- उमट आई हैं अंगुलियाँ
- उसी दिन मरना चाहता हूँ मैं
- एक अधूरा मरा स्वप्न
- एक किरण पर्याप्त है!
- एक दिन विदा लेनी ही पड़ती है
- एक रात की पढ़ाई
- एक रात
- ऐ पथिक तूँ चल अकेला
- ऐसी कविता रच डाल कवि!
- ओ टिमटिमाते दीप!
- ओस
- कब पूर्ण होगी यह प्रतीक्षा
- कवि की अमरता
- कविता आख़िर है क्या
- कविता और जीविका: दो विचार
- कविता का ढाँचा!
- कविता में गाली!
- कविता
- कहीं देर न हो जाए!
- कामना!
- कायर
- कितना कठिन हो जाता है
- कृष्णमूर्ति को याद करते हुए
- केवल बोलती है पशुता
- कोई नहीं है साथ . . .
- कौन देता है इतना साहस!
- क्रान्ति
- खोज
- गणतंत्र
- गुटबंदियों के दौर में
- गौमाता
- चल-चल चल-चल चल-चल चल
- चलने दो समर भवानी....
- चिंता
- चुनाव का दौर
- जागी प्रकृति फिर एक बार . . .
- जागो मत!
- जीवन-नौका खेते रहना
- जो क्षमा माँग लेंगे
- जो होली में घर नहीं गए
- झपकी
- झुग्गियों के सवाल . . .
- झोपड़ी की सैर
- डूबता अंतिम सितारा
- तुम्हारा गिरना
- तुम्हारे शून्य में!
- तेरी याद नहीं आई!
- थिरक थिरक रे थिरक थिरक मन . . .
- दिन और रात
- दिनचर्या
- द्वैत
- धरा के निश्वासों में न ढूँढ़ो गगन को
- धूप और बारिश
- नया स्वप्न
- नानी को याद करते हुए
- निराशा
- निराशा – 2
- निर्जीव!
- पाँव मेरे मत बहकना!
- पिता
- पुस्तकें
- प्रबल झंझावात है . . .
- प्रेम
- फिर कभी!
- फिर तुम्हारी याद आई
- बस इतना करती हैं कविताएँ
- बोलो!
- बोलो!
- भक्त की पुकार
- भटकन!
- भर परों में आग पक्षी
- भविष्य की पत्नी के प्रति
- भिन्न हैं स्वर हमारे तुम्हारे स्वरों से
- भीष्म – कृष्ण संवाद
- भोर अकेला साँझ अकेली
- महाकवि निराला
- महाराणा को श्रद्धांजलि
- माँ
- मित्र के प्रति!
- मुकुट धरो हिंदी के सर पर . . .
- मुक्ति
- मेरे पिताजी!
- मैं अपना दुख-द्वन्द्व लिए फिरता हूँ!
- मैं कहता आँखन देखी
- मैं क्यों अपनी पतवार तजूँ?
- मैं सदा खोजता रहा रश्मि
- मैं ज़मीन पर हूँ
- मैंने ख़ुद का निर्माण किया है
- मौलिकता का सत्य
- यह क़लम समर्पित न होगी . . .
- युग उसको न क्षमा करेगा!
- रात के घुप अँधेरे में
- रात
- लीक से परे
- लौटना
- वर्णमाला का विकास
- वासना के पाश में
- विचार
- विरोधाभास
- वृक्ष का कटना
- व्यवस्था
- शिव तांडव: एक नए कोण से
- शूर! समर में जाना होगा . . .
- संकुचन
- संवेदना-2
- सजा हुआ जंगल
- सरस्वती - वन्दना
- सर्दी के समय (एक)
- सर्दी के समय (दो)
- सवाल!
- सहज हूँ . . .
- साफ़ सुथरे कमरे!
- सूरज का छल
- सूर्य
- स्थानीय नदी
- हतोत्साहित मन
- हत्याओं के दौरान
- हवा
- हारों की शृंखला
- हिंदी दिवस पर
- हिमालय से
- हीनता का अतिराष्ट्रवाद!
- हुंकार
- हे उदासी
- हे ध्वज मेरे
- हे मेरे कवि!
- हे हरि!
- ग़लतफ़हमी
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- स्मृति लेख
- गीत-नवगीत
- कविता - क्षणिका
- हास्य-व्यंग्य कविता
- कविता - हाइकु
- कहानी
- बाल साहित्य कविता
- किशोर साहित्य कविता
- विडियो
-
- ऑडियो
-