दिनचर्या 

15-12-2025

दिनचर्या 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

धूप का कोई टुकड़ा 
चौबीस घंटे के कुछ हिस्से में 
खखारकर थूक जाता था 
और हम उसे दिन कह देते थे 
 
चीखों को जंगली जानवरों की आवाज़ समझते थे 
लपटों को डूबते हुए सूर्य का प्रतिबिम्ब 
रतौंधी के इसी क्षण में नींद की आहट मिलती थी 
और हम कहते थे रात हो गयी है 
 
मगरमच्छों से भरी अँधेरी नदी में 
सुबह की गयी प्रार्थनाओं के भरोसे 
नींद की विचित्र लहरों में 
छोड़ आते थे कोई अधपकी कविता 
और हम उसे स्वप्न कहते थे। 

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