नानी को याद करते हुए 

15-11-2025

नानी को याद करते हुए 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 288, नवम्बर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

तुम्हारी प्रतीक्षा देह से परे कोई तत्त्व है 
तुम अपनी आँखें दे जाओगी 
उस कुएँ को 
या उस नीम के पेड़ को 
जैसा कि मृत्यु के समय अक्सर होता है 
लोग ख़ुद में सिकुड़ते हैं 
और दूसरों में फैलते हैं 
सो तुम भी मुझमें फैल रही हो
उगते हुए सूरज के प्रकाश किरणों की तरह 
धीरे धीरे क़दम बढ़ाती
मेरी बचपन से अब तक की धरती पर 
ध्रुव नहीं बल्कि तुम्हारा ही तारा देखूँगा
जब कभी दिशा भटक जाऊँगा
तुम्हारी तेल-मालिशें साइबेरिया की ठंड में भी
मुझे गर्मी देंगी
तुम्हारे चुम्बन जीवन भर मुझे प्रेम से रिक्त नहीं होने देंगे! 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
स्मृति लेख
गीत-नवगीत
कविता - क्षणिका
हास्य-व्यंग्य कविता
कविता - हाइकु
कहानी
बाल साहित्य कविता
किशोर साहित्य कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में