मौलिकता का सत्य 

15-10-2025

मौलिकता का सत्य 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 286, अक्टूबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

मुझमें क्या मौलिक है! 
कोई भी देख सकता है कि मैंने नक़ल की है 
मेरी ध्वनि के मूल की प्रतिध्वनि सुन सकता है 
मेरी आलमारी में रखी किताबों से कुछ 
अनुमान लगा सकता है 
इतनी छोटी-छोटी और शातिर चोरियाँ की हैं कि 
सारे ढेर साबुत बचे लगते हैं 
मेरे मन का छिपा आदर्श यही है कि 
अभिव्यक्ति की असमर्थता से श्रेष्ठ है—
मौलिकता का बलिदान! 
 
पर कहीं से तो उठ रही कोई बेचैनी 
किसी बेहद सँकरे कमरे में फँसने का आभास 
प्रकाश के अभाव में सीलन जैसा कुछ 
मरे हुए जैसी कुछ गंध 
बचाव में खड़ा कर पाता हूँ मैं ये सूना संतोष 
कि मौलिकता की खोज में कुछ न कुछ मौलिक होता जा रहा हूँ! 

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