चराग़े-दिल

छोड़ आसानियाँ गईं जब से
साथ दुश्वारियाँ रहीं तब से।

लुत्फ़ जीने का पा लिया तब से
दर्द साँसें है ले रहा जब से।

इतनी गहरी घुटन मेरे मन की
हर्फ़ निकला न एक भी लब से।

रात भर एक पल न सो पाई
सुबह का इंतज़ार था शब से।

जो मेरी साँस में समाया था
मैं उसे माँगती रही रब से।

आह बनके टपक पड़े तारे
जिनका रिश्ता रहा नहीं शब से।

ग़ालिबो-मीर कितने आए गए
शेर अब वो नहीं रहे तब से।

इतना ईमान तुझपे है ‘देवी’

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