चराग़े-दिल

राहत न मेरा साथ निभाए तो क्या करूँ?
घर, धूल गर्दिशों की सजाए तो क्या करूँ?
 
वो बात मेरे मन की न कागज पे आ सकी
वो दास्तां कुछ और सुनाए तो क्या करूँ?
 
क्यूं दिल से कर रही हैं यूँ खिलवाड़ हसरतें
दामन को आग घर की जलाए तो क्या करूँ?
 
मैं ख़्वाहिशों की क़ैद में रहती रही सदा
मन को रिहाई फिर भी न भाए तो क्या करूँ?
 
किसने कहा कि दिल ये मेरा बे-ज़ुबान है
तेरी समझ में बात न आए तो क्या करूँ?
  
अंतर में मेरे राम बसे हैं, रहीम भी
काबू में मेरा मन जो न आए तो क्या करूँ?
 
‘देवी’ सफर में यूँ भी अकेली रही हूँ मैं
उल्फ़त किसी की रास न आए तो क्या करूँ?

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