चराग़े-दिल

गुफ़्तगू हमसे वो करे जैसे
खामुशी के हैं लब खुले जैसे।
 
तुझसे मिलने की ये सज़ा पाई
चांदनी-धूप सी लगे जैसे।
 
तोड़ता दम है जब भी परवाना
शम्अ की लौ भी रो पड़े जैसे।
 
यूँ ख़यालों में पुख़्तगी आई
बीज से पेड़ बन गये जैसे।
 
ये तो नादानी मेरे दिल ने की
और सज़ा मिल गई मुझे जैसे।
 
याद ‘देवी’ को उनकी क्या आई
ज़ख़्म ताज़ा कोई लगे जैसे।

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