चराग़े-दिल

वैसे तो अपने बीच नहीं है कोई ख़ुदा
लेकिन ख़ुदी ने दोनों में रक्खा है फासला।

दीवार की तरह है ये रिश्तों में इक दरार
डर बनके दिल में पलती है इन्सान की ख़ता।

ये ज्वार भाटे आते ही रहते हैं ज़ीस्त में
हर रोज़ आके जाते हैं देकर हमें दगा़।

तेरे ही ऐतबार में डूबी हुई हूँ मैं
देखो ये ऐतबार ही मुझको न दे डुबा।

भंवरों के इन्तज़ार में मुरझा गए सुमन
ऐ मौत, आ मुझे भी तू अपने गले लगा।

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