चराग़े-दिल

मिट्टी का मेरा घर अभी पूरा बना नहीं
है हमसफ़र ग़रीब मेरा, बेवफ़ा नहीं।

माना कि मेरे दिल में ज़रा भी दया नहीं
फिर भी किसी के बारे में कुछ भी कहा नहीं।

आँगन में बीज बोए कल, अब पेड़ हैं उगे
हैरत है शाख़ पर कोई पत्ता हरा नहीं।

विशवास कर सको तो करो, वर्ना छोड़ दो
इस दम समय बुरा है मेरा, मैं बुरा नहीं।

अच्छी बुरी हैं फितरतें, टकराव लाज़मी
शतरंज का हूँ मोहरा मैं फिर भी चला नहीं।

रस्मों के रिश्ते और हैं, जज़बात के हैं और
मैंने ज़बां से नाम किसी का लिया नहीं।

शादाब इसलिये भी है दिल की मेरी ज़मीं
क्योंकि मेरा ज़मीर है जिंदा, मरा नहीं।

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