चराग़े-दिल

इक नश्शा-सा बेख़ुदी में हो
हुस्न ऐसा भी सादगी में हो।

दे सके जो ख़ुलूस का साया
ऐसी ख़ूबी तो आदमी में हो।

शक की बुनियाद पर महल कैसा
कुछ तो ईमान दोस्ती में हो।

दुख के साग़र को खुश्क जो कर दे
ऐसा कुछ तो असर ख़ुशी में हो।

ख़ुद-ब-ख़ुद आ मिले ख़ुदा मुझसे
कुछ तो अहसास बंदगी में हो।

अपनी मंज़िल को पा नहीं सकता
वो जो गुमराह रौशनी में हो।

सारे मतलाब परस्त है ‘देवी’
कुछ मुरव्वत भी तो किसी में हो

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