चराग़े-दिल

वो नींद में आना भूल गए
हम ख़्वाब सजाना भूल गए।

दरिया तक दिल को ले आए
पर प्यास बुझाना भूल गए।

कुछ ऐसे उलझे ख़ारों में
दामन को बचाना भूल गए।

कुछ राह में ऐसे मोड़ मिले
घर वापस आना भूल गए।

दीवार कुरेदी यादों की
और ज़ख्म दिखाना भूल गए।

कस्में भी हमें कुछ याद नहीं
रस्में भी निभाना भूल गए।

पल भर में बदलता है मंज़र
हम याद दिलना भूल गए।

इस जीने की उलझन में ‘देवी’
बचपन का ज़माना भूल गए।

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