अतिथि करोनो भवः

01-09-2020

अतिथि करोनो भवः

डॉ. अशोक गौतम

बीवी तो ख़ैर अपने मायके वालों के सिवाय घर में भगवान के आने पर भी परेशान ही रहती है, पर अबके ज्यों ही दरवाज़े की घंटी बजी तो मैं भी परेशान सा हो गया। इस करोनोकाल में ये किस निडर की हिम्मत हुई होगी जो घर से बाहर आया? ये किसको अपनी जान प्यारी नहीं होगी? ये कौन अपने को अजर अमर समझने की ग़लती कर रहा होगा? ये कौन ये जानते हुए भी मरने का दुस्साहस कर रहा होगा? ये आने वाला ख़ुद तो मरेगा ही, मुझे भी मार डालेगा। 

अरे भैया! जो मरने को इतना ही मन हो रहा है तो हमें साथ लेकर क्यों मरना चाहते हो? बेहतर हो, अपने साथ नरक जाने के लिए किसी और को अपने साथ ले जाओ। देखो, तुम मेरे चाहे कितने की ख़ास होंगे पर कम से कम मुझे तो नहीं मरना है अभी! भले ही घर में हँसते हुए रोज़ तिल-तिल मरता रहूँ। मुझे तिल-तिल मरते हुए हँसना पूरी तरह स्वीकार है पर.…

मन में दरवाज़े पर लगी घंटी बजते ही बीसियों सवाल समुद्र में आए ज्वार-भाटे की तरह उठे बैठे। पुराने संस्कारों का कुछ कुछ होने के चलते बुझे मन से बिस्तर पर लेटी भजन सुनती करती, बीवी की पूर्वानुमति के बिना ही न चाहते हुए भी दरवाज़ा खोला तो सामने अजीब से अजीब सी मुद्रा में! पर मुस्कुराते हुए। बड़े दिनों बाद किसीके चेहरे पर मुस्कान देखी तो मन भर आया! आह! मैं भी तो कभी ऐसे ही हँसा करता था। करोनोकाल में किसीके चेहरे पर पहली बार ऐसी मस्त मुस्कुराहट देखी थी तो उनके चेहरे के साथ घिघियाते मुस्कुराए बिना न रह सका। सच कहूँ! जबसे दिल दिमाग़ में करोनो का भय मेहमान बनकर बैठा है, जीव हँसना ही भूल गया है। एकाध जो ज़ोर ज़बरदस्ती करते हँसते भी हैं तो रोते हुए से हँसते हैं। उनका पता ही नहीं चलता की ये कमबख़्त हँस रहे हैं कि रो रहे हैं।

“कौन?” मैंने आधा दरवाज़ा खोल बीच में अपनी टाँग अड़ा हैरानी से पूछा तो अतिथि ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानते नहीं? मैं! मैं हूँ!”

"नहीं जानता! इन दिनों तो हम अपने को भी नहीं जानते। तो तुम कौन?" मैंने उन्हें उनके सिर से पाँव तक घूरते पूछा तो वे हँसते हुए मुझे एकटक निहारते बोले, “मैं वही जिसकी तुम इतने सालों से पौनी-सौनी पूजा कर रोज़ मिनट-मिनट बाद दस-दस वर माँगते रहे हो! मैं वही जिसे कल तक तुम मुझे जीवों में देखना छोड़ पत्थरों में ढूँढ़ते रहे हो। जब तक मैं न मिला तब तक तो पत्थरों के दिन-रात फेरे लगाते रहे और आज जब मैं फ़ेस टू फ़ेस तुम्हारे सामने हूँ तो... ये कैसी आस्था है वत्स?" 

"पर मैं तो तुम्हें बिल्कुल नहीं जानता। मैंने तो आज तक पड़ोसियों को छोड़ किसीसे कुछ नहीं माँगा। मैंने दो टूक कहा तो वे एकबार फिर मुझ पर हँसने लगे तो मैंने पूछा, "अच्छा तो कहाँ से आए हो तुम? मेरे गाँव से?"

"नहीं!"

"तो बीवी के दूरपार के रिश्तेदार होंगे?"

"नहीं!"

"तो फिर कहाँ से आए हो मेरे बाप?" मेरा चिढ़ना स्वाभाविक था। सो न चाहते हुए भी चिढ़ना पड़ा ताकि उनको लग जाए कि मैं उनके आने पर क़तई प्रसन्न नहीं हूँ और वे यहाँ से जाने को अपना मन बनाने लग जाएँ। 

"स्वर्गलोक से वत्स!"

"स्वर्गलोक से? वहाँ अभी तक लॉकडाउन नहीं हुआ है क्या? मारे जाओगे सारे के सारे। देख लेना, बहुत पछताओगे," पर स्वर्गलोक का नाम सुनते ही बिस्तर पर पसर प्रभु स्मरण करती मुझे तंग करने के बाद स्वर्ग जाने की इच्छा पाले अधेड़ बीवी जवान घोड़ी की तरह बिदकी, “बंद करो दरवाज़ा! किसके मुँह लग रहे हो सुबह सुबह?"

"कोई अतिथि आए हैं। स्वर्गलोक से आया बता रहे हैं अपने आपको।" 

"स्वर्गलोक से? यहाँ तो आजकल पड़ोस से पड़ोसी तक आने से डर रहा है।"

"सो ही तो छानबीन कर रहा हूँ। अच्छा तो, जनाब स्वर्गलोक से बिन ई-पास के ही आ गए? हद है आपकी भी ! इधर अफ़सरों को छोड़ जनता को एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर भी घर जाने को पास नहीं मिल रहे और आप हो कि बिन ई-पास के ही। अच्छा तो, एक बात बताओ! तुम इतने बैरियर पार कर कैसे आ गए?"

"कैसे क्या? जैसे ले-देकर सब आ रहे हैं। जेब का भूखा यहाँ कौन नहीं?" कह वे हमारी चाक चौबंद व्यवस्था पर मुस्कुराए।

"मतलब??"

"हाँ तो! क्या हो गया वत्स! इसमें कौन सी बड़ी बात है? चौंक क्यों रहे हो? वैसे मैं तो कहीं भी बिन पास के ही आता जाता रहा हूँ आजतक।"  पता नहीं तब कहाँ से उनको कहते-कहते अचानक छींक आ गई। उनकी छींक की आवाज़ भजन के सुर के साथ सुर मिलाती गाती अधसोई बीवी को सुनाई दी तो वह बिस्तर पर से ही चीखी, "हाय राम! ये कौन आ गए हमारे घर। यही छींके कि तुम?"

"नहीं। बंधु ही छींके हैं।"

"मैं तो कहती हूँ कि जितनी जल्दी हो सके दरवाज़ा बंद कर दो बस!"

"देखो, तुम्हें ही छींक आई है न?" मैंने उनकी छींक उन पर थोपते कहा। 

"तो क्या हो गया! जिसके नाक होगी उसे ही तो छींक आएगी न! बिन नाक वाले क्या ख़ाक छींकेंगे?"स्वर्गलोक से आए प्राणी ने सहज कहा और अपनी जेब से रूमाल निकाल अपनी नाक साफ़ करने लगे। वर्ना आजकल तो लोग अपना नाक तक दूसरों के रूमाल से पोंछते हैं। तब वे अपना नाक अपनी ही रूमाल से पोंछ आगे बोले, "भीतर नहीं आने दोगे क्या भक्त?" 

"मतलब?" मैंने दरवाज़े और उनके बीच अड़ाई टाँग और अकड़ा ली।

"मतलब कुछ नहीं। बहुत थक गया हूँ चलते-चलते," कहते-कहते वे देहरी से अंदर पाँव रखने को हुए तो मैंने बीवी को चौकन्ना किया, "हे बीवीश्री! महोदय भीतर आने को कह रहे हैं? अंदर आने दूँ क्या?" मैंने बीवी से उनको भीतर लाने की परमिशन माँगी तो बीवी बोली, "भीतर? मरना है क्या?"

"मैं मारने नहीं, तुम्हें वरदान देने आया हूँ," स्वर्गलोकी ने कहा तो मैं चुप। उस वक़्त न मैं इधर का तो न उधर का। आगे कुआँ तो पीछे खाई। इधर दरवाज़े और अतिथि के बीच टाँग अड़ाए मैं चुप तो उधर स्वर्ग से आया वह अतिथि चुप। 

अच्छा लगा यह देख कर कि यह बात अतिथि भी जानता गया कि किसी भी लोक के किसी भी घर में किसी भी बीवी के बिन कहे पत्ता तक नहीं हिलता। अचानक वे गले के पास खारिश करने लगे तो मैंने पूछा," गले के पास क्या हो रहा है?"

" खुजली सी हो रही है। बाहर गर्मी ही इतनी है कि... गला ही क्या पूरा बदन ही खुजला रहा है।"

"...और गला सूख तो नहीं रहा हे अतिथि तुम्हारा?"

"वह तो सूखेगा ही। इन गर्मी के दिनों तो बारहों महीने लबालब रहने वाले तालाब तक सूख जाते हैं। ये तो मरा गला है," सुन मैं कुछ और चौंका। 

"तुम्हारा चेहरा तो लाल लग रहा है?" मैं देखते ही देखते करोनो सर्वज्ञ होने लगा। 

"बाहर गर्मी देख रहे हो? ऐसी गर्मी में तो जो कोई बर्फ़ का चेहरा लगाए भी आए तो वह भी दो ही मिनट में पिघल कर लाल हो जाए।"

"अरे, तुम्हारी तो तुम्हारी साँसें भी फूली हुई हैं? उनकी साँसों की आवाज़ सुन मैं कुछ और चौंका।

"पैदल चल कर आया हूँ न!" मुझे लगा, बंधु ज्यों अंदर आने को एक और सच्चा बहाना बना रहे हों। वैसे भी बहाने बनाने में तो हमारी मास्टरी है। वह कोई चाहे मृत्युलोक का हो चाहे किसी अन्य लोक का, " ...और?? क्या कहा तुमने?? मुझे सुना नहीं!" दरवाज़े पर खड़े अतिथि ने अपने कान में उँगलियाँ देते पूछा तो मैं कुछ और चौंका," मतलब, तुम्हें ठीक ढंग से सुनाई भी नहीं दे रहा?"

"इस शांति ने मुझे परेशान कर दिया है वत्स!" 

"और जीभ का स्वाद?" 

"इस महामारी में किसे क्या स्वाद लगेगा वत्स! अब तो अमृत पीने के बाद भी लगता है ज्यों सड़ा पानी ही पी रहे हों।" 

"अच्छा तो... सूँघों कि मैंने किस कंपनी का परफ़्यूम अपनी बॉडी पर लगाया है, ये चीनी कंपनी का है या..."

"समाज में दिन प्रतिदिन बढ़ती वैचारिक दुर्गंध में सच पूछो तो अपनी सूँघने की शक्ति भी जवाब दे गई है," मतलब, झूठ को सच में बदलने का एक और सॉलिड बहाना।

"क्या कह रहा है ये? गया या..." बीवी ने चारपाई पर पड़े-पड़े ही पूछा तो मैंने कहा," कुछ साफ़-साफ़ नहीं कह रहे। पर बड़े दिनों बाद कोई घर आया है तो अतिथि को सैनिटाइज़ कर भीतर ले आऊँ क्या?"

"इसके पास अपना सैनिटाइज़र नहीं है क्या?" तब बीवी के शब्दों को अपनी ढाल बना मैंने उनसे पूछा, "तुम्हारे पास अपना सैनिटाइज़र नहीं है क्या?"

"वह क्या होता है? हम तो रोग शोक से ऊपर उठे हैं वत्स! ऐसे में मैं सैनिटाइज़र क्यों रखूँ अपने पास? सैनिटाइज़र वे अपने पास रखें जिनके आदर्श, चरित्र गंदे हों।" 

"हद है यार आपकी भी! अजीब बंदे हो तुम भी! देखो, मैं तो भूल ही गया कि तुमने चेहरे पर मास्क भी नहीं लगाया है?"

"अगर मास्क लगाता तो तुम मुझे कैसे पहचानते?" कि तभी बीवी चारपाई पर से ही बड़बड़ाई, "सबेरे-सबेरे किसके मुँह लग गए? चलो, चाय बनाओ जल्दी से। मैं प्रभु का नाम भजते-भजते थक गई," मैंने अतिथि को हाथ जोड़े, दरवाज़ा बंद किया और बीवी को चाय बनाने दुम हिलाता किचन में आ गया। 

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