हवा 

अभिषेक पाण्डेय (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तुम बहती हो 
तो मुझे पक्का यक़ीन होता है 
कि माँ कहीं आस-पास है 
डालियाँ एक-दूसरे को चूमती हैं 
गिर पड़े पत्ते ऊपर उठते हैं 
कि शायद दुबारा जुड़ जाएँ 
तुम्हारी सबसे ख़ास बात कि 
तुम चीज़ों की यांत्रिकता भंग करती हो 
खड़खड़ाकर खोल देती हो 
किसी अनाम पुस्तक की 
कोई भूली हुई कविता 
 
यद्यपि तुम तूफ़ान भी लाती हो 
छोटे-छोटे बादलों का सिर पकड़कर— 
आपस में लड़ाती हो 
कई बार तुम कविता की कोई पंक्ति उड़ा ले गई 
और मैं दूर तक तुम्हें पछियाता रहा 
तुम किसी वृक्ष की सबसे ऊँची डाल में बैठ गई 
मैं नीचे खड़ा मनाता रहा 
पर तुम्हें क्षमा करना ही पड़ता है 
क्योंकि तुम्हें दंड देना 
उस अदृश्य हाथ को दंड देना है 
जो अक्सर आँसू पोंछ देता है 
लम्बी और सुस्त सड़कों पर 
आभास देता है 
कि कोई और है 
जो साथ चल रहा है 
तुम्हारा आना-जाना 
एक उम्मीद है 
कि ये जीवित है 
अभी बोल पड़ेगा! 

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