चाय पियो जी
पवन कुमार ‘मारुत’
(देव घनाक्षरी छन्द)
चाहत चहुँ ओर चाय की करती कंगाल,
पति-पत्नी पुत्र-पुत्री पीवत पहर-पहर।
लत लगी लोगों को करती कमज़ोर काया,
बीमारी बहू बढ़ा दी देहात शहर-शहर।
तुरन्त तरोताज़ा तुम्हें करती कैसे कहो?
कैफ़ीन-करवाल का कुरूप कहर-कहर।
नहीं नर मानता “मारुत” मना करने की,
प्राणी पीता प्लास्टिक के कप में ज़हर-ज़हर॥
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