
संपादकीय - ट्रंप की देन: राष्ट्रवादी उपभोक्तावाद
साहित्य कुञ्ज के इस अंक में
कहानियाँ
अंतिम सिंगार
उसका पूरा जीवन समर्पण था, परिवार के प्रति। जब तक पति थे बहुत मान-सम्मान से गुज़रा था जीवन। न माथे से कभी सिंदूर धुँधला होता न कभी जूड़े की वेणी मुरझाती। सत्तर की उम्र में भी नई-नवेली दुलहन की आगे पढ़ें
अपरिभाषित प्रेम
गाँव की परिधि से कुछ दूरी पर स्थित एक सरकारी महाविद्यालय—चारों ओर फैली हरियाली, आकाश को छूते वृक्षों की छाँव और समय की गवाही देता खपरैल की छतों वाला वह भवन, जहाँ न केवल शिक्षा दी जाती थी, बल्कि आगे पढ़ें
गाँव की बेटी
घटना कुछ सालों पुरानी है, जब संचार क्रांति नहीं आयी हुई थी और ज़्यादातर गाँव कच्ची सड़कों द्वारा ही जुड़े हुए थे शहरों से और बैलगाड़ियाँ एक मुख्य साधन थीं आवागमन का। बिजली अभी भी गाँवों में धीरे-धीरे पहुँच आगे पढ़ें
जड़ से कटते रिश्ते
“बी प्रैक्टिकल पापाजी! आपको भी मालूम है कि मैं अपनी बचत से मुम्बई जैसे शहर में घर नहीं ले सकता। फिर आपके बाद सब मेरा ही तो होगा, तो आज क्यों नहीं? आप भी साथ चलिये हमारे। यहाँ अब आगे पढ़ें
पाटदेई
मूल (ओड़िया): वीणापाणि मोहंती अनुवाद: दिनेश कुमार माली वीणापाणि मोहंती (1936) जन्म-स्थान: चांदोल, केंद्रपड़ा प्रकाशित गल्पग्रंथ: ‘नव तरंग’ (1963), ‘कस्तुरी मृग ओ सबुज अरण्य’, (1967), ‘तटिनीर तृष्णा’, (1972), ‘अंधकारर छाई’, (1976), ‘मध्यांतर ’ (1979), ‘वस्त्रहरण’, (1980), ‘खेलणा’, (1983), ‘पाटदेई’ आगे पढ़ें
प्रेमिका, समुद्र और वह लड़की
बार-बार तट से टकराकर वापस लौट जाती लहरों को अपनी दृष्टि में भरने की वह असफल कोशिश कर रहा था। कल भी वह देर तक इसी समुद्र तट पर और इसी स्थान पर बैठा रहा था। लहरों के सम्मोहन आगे पढ़ें
रंग बरस गया
एक इत्तिफ़ाक़ ही था, लिफ़्ट थोड़ी देर को रुक गयी थी। लगा कुछ ख़राबी आ गयी थी। अक्षत होली खेलकर वापस घर आ रहा था। चेहरा रंग से पुता था, दोस्तो ने थोड़ी सी भाँग ज़बरदस्ती पिला दी थी। आगे पढ़ें
सुबह का भूला
फ़ाइव स्टार होटल जैसा बड़ा अस्पताल, लॉबी में भीड़-भाड़ के बीच अल्पना अकेली बैठी है, कॉफ़ी शॉप की एक टेबल पर। कॉफ़ी से उठता धुँआ अल्पना की आँखों में उतर आया है। अल्पना के चेहरे पर तनाव झलक रहा आगे पढ़ें
हास्य/व्यंग्य
आह! वाह! स्वाह!
एक्स जीजनाबजी पाँच सात महीना पहले तक रचना छपने से पहले पारिश्रमिक देने वाली साहित्यिक पत्रिका के मेरे घनिष्ठ वरिष्ठ सपांदक थे या हैं, जो समझना चाहो, समझ लीजिए। वे अपनी ससम्मान सेवानिवृत्ति वाली साँझ से लेकर कल तक आगे पढ़ें
जहाँ चाहिए वहाँ थूकिए क्योंकि आप माननीय हैं
हम आदमी के स्वभाव को बदल नहीं सकते हैं। वह अपने स्वभाव यानी आदत से मजबूर होता है। हमारे पूर्वांचल में एक कहावत है कि ‘जवन बानी पड़ी लरिकाई छूटे न बुढ़ाई दईयां’। कहने का भाव यह है कि आगे पढ़ें
ड्रम युग: आधुनिक समाज का नया फ़र्नीचर
पहले ज़माने में दहेज़ में स्टील के बरतन, सिलाई मशीन और सोने की चूड़ियाँ दी जाती थीं। लेकिन अब समाज इतना प्रगतिशील हो गया है कि लोग दहेज़ में ‘ड्रम’ देने से घबराने लगे हैं। भाई, ज़रा सोचिए, ग़लती आगे पढ़ें

मंदिर में जूते चोरी
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ, श्रीमती जी आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे। श्रीमती जी से नज़रें चुराकर बार-बार उस दिशा में देख ही लेता हूँ, जहाँ अभी-अभी हमने अपने जूते छुपाए हैं। सच पूछो तो जूते चुराए जाने के ख़्याल से आगे पढ़ें
व्यंग्य का प्रहार
लोगों पर तीखा प्रहार करते-करते हम व्यंग्य शास्त्री हो गये। ऐसा व्यंग्य कसते थे कि कई मानसिक रूप से घायल हो जाते थे। कई तो ईर्ष्या की आग में झुलस जाते थे। कई तो हमें देखकर रास्ते की दिशा आगे पढ़ें
होली का हाहाकारी हाल: जब रंगों ने पहचान ही मिटा दी!
होली, यानी रंगों का त्योहार! लेकिन सच कहूँ तो यह त्योहार कम, राष्ट्रीय पहचान संकट ज़्यादा है। इस दिन दुनिया में दो ही तरह के लोग बचते हैं—एक जो पहचान में आ रहे होते हैं और दूसरे जो होली आगे पढ़ें
आलेख
अंतरराष्ट्रीय जल दिवस पर—मेरा मंथन
22 मार्च को प्रति वर्ष ‘अंतरराष्ट्रीय जल दिवस’ मनाया जाता है। किसी भी दिन को विशेष दिवस के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने का अर्थ ही है कि उस दिशा-विषय पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। जल पृथ्वी आगे पढ़ें
असफलता की चाह-आसान है राह
असफलता की चाह की बात अजीब अवश्य है किन्तु सामान्य सत्य यही है कि सामान्य जन सफलता की बात करते हुए असफलता के लिए काम करते हैं; वे असफलता को ही जीना चाहते हैं। हम स्वस्थ रहना नहीं चाहते, आगे पढ़ें

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, जिन्हें हिंदी का पाणिनि कहा गया
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी (1895–1981) हिंदी के महायोद्धा हैं। अपने आप में अतुलनीय, जिनकी कोई दूसरी मिसाल हमारे यहाँ नहीं है। साथ ही परम विद्वान, मर्मज्ञ और ऐसे अद्भुत व्याकरणाचार्य, जिन्हें पूरा हिंदी जगत बड़े आदर और कृतज्ञता के साथ आगे पढ़ें
उदार ब्रिटेन
यहाँ ब्रिटेन में द्वितीय विश्व-युद्ध के पश्चात ढेरों लोग निर्धनता का शिकार हो गये थे। उस कारण उत्पन्न हुईं बीमारियाँ, भुखमरी, गंदगी, अज्ञानता व आलस्य जैसी ‘पाँच गम्भीर समस्याओं’ से निपटने हेतु सरकार ने बहुत सोच-विचार कर 1948 में आगे पढ़ें
चैत्र नवरात्रि: आत्मशक्ति की साधना और अस्तित्व का नवजागरण
सृष्टि के चक्र में समय कभी ठहरता नहीं, वह सतत प्रवाहमान है। यह प्रवाह बाह्य जगत में जितना स्पंदित होता है, उतना ही हमारे आंतरिक संसार में भी। चैत्र नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की गति और आगे पढ़ें
तेज़ी से विलुप्त हो रहा पारसी समुदाय
आज से कुछ हज़ार साल पहले हिमालय से कुछ आर्य नीचे उतर कर मैदानी इलाक़े में बस गए थे। उनकी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और ये पूरे मैदानी इलाक़े में फैल गए। आर्यों के नाम पर इस आगे पढ़ें
प्रसिद्धि की बैसाखी बनता साहित्य में चौर्यकर्म
हरियाणा के एक लेखक द्वारा राज्य गान के रूप में एक गीत के चयन को लेकर हाल ही में एक बहस छिड़ी है, जिस पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाया गया है। अन्य लेखकों ने इस मामले पर अपनी आगे पढ़ें
बांग्ला मंच की प्रतिष्ठित नाट्यकार शांओली मित्र का अपने नाट्य विषयक संस्मरण
अनुवाद: डॉ. रानू मुखर्जी नाट्यदंपत्ति आदरणीय शंभू मित्र—तृप्ति मित्र की एक मात्र पुत्री शांओली मित्र का जन्म (1948–2022) कोलकाता में हुआ था। शांओलि मित्र उनके सृष्टि की यथार्थ वाहक हैं, अगर कहा जाए तो वह मंच की ही संतान आगे पढ़ें
बुद्धि पर पहरा
जन्म कुंडली का पंचम भाव बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण यह है कि हमारा ज्योतिष शास्त्र पूर्णतः कर्मफल के सिद्धांत पर ही आधारित है और पंचम भाव पूर्व अर्जित पुण्यों का भाव कहलाता है। प्रत्येक जातक जन्म आगे पढ़ें
रंगमंच: समाज की आत्मा और अभिव्यक्ति का मंच
रंगमंच केवल मंच पर अभिनय करने की कला नहीं, बल्कि यह मानव समाज का एक सशक्त दर्पण है। यह व्यक्ति के भीतर छुपे भावों, चिंताओं और आकांक्षाओं को न केवल अभिव्यक्ति देता है, बल्कि समाज को सोचने और बदलने आगे पढ़ें
रूस यूक्रेन युद्ध में भाषा विवाद का बारूद
हाँ, यूक्रेन और रूस के युद्ध में रूसी भाषा को लेकर विवाद एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है, जो संघर्ष के सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को दर्शाता है। यह विवाद ख़ास तौर पर 2014 में शुरू हुए संकट से जुड़ा आगे पढ़ें
लघुपत्रिका आंदोलन
विरोध में हाथ भी उठा रहे और काँख भी ढकी रहे: संप्रति लघुपत्रिकाएँ और उनकी पक्षधरता का प्रश्न लघु पत्रिका (लिटिल मैग्ज़ीन) आन्दोलन मुख्य रूप से पश्चिम में प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) के औज़ार के रूप में शुरू हुआ था। आगे पढ़ें
विवाह कब होगा: शीघ्र, समय पर या विलंब से
भारतीय संस्कृति और हिंदू वैदिक सभ्यता के अंतर्गत षोडश संस्कारों का उल्लेख हमें देखने मिलता है। इन सभी षोडश संस्कारों में विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। भारतीय संस्कृति में विवाह एक पवित्र बंधन के साथ-साथ समाज की आगे पढ़ें
विश्व कविता दिवस: अभिव्यक्ति का वैश्विक उत्सव
कविता, मानव अभिव्यक्ति का सबसे कोमल और सशक्त माध्यम है। यह भावनाओं, विचारों, संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ को शब्दों में ढालने की कला है। इसी अभिव्यक्ति को सम्मान देने के लिए हर वर्ष 21 मार्च को विश्व कविता दिवस आगे पढ़ें
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं . . .
साये में धूप के पचास वर्ष पर दुष्यंत की कालजयी कीर्ति ‘साये में धूप’ (वर्ष 1975) के पचास वर्ष मुकम्मल होने पर पूरे देश में इसे एक उत्सव की तरह मनाया जा रहा है। यह एक ऐसी आगे पढ़ें
हिन्दी काव्य में राष्ट्रीय चेतना की परम्परा एवं स्वरूप
वैदिक युग से राष्ट्र के प्रति प्रेम कवियों का प्रिय विषय रहा है। नव रसों में ‘वीर रस एवं उत्साह’’ नामक स्थायी भाव को प्रमुखता से स्थान मिला। कवि की लेखनी में यदि अपने देश के प्रति प्रेम और आगे पढ़ें
समीक्षा

अब मैं बोलूँगी-एक खरी और ज़रूरी किताब
समीक्षित पुस्तक: अब मैं बोलूँगी (डायरी) लेखक: स्मृति आदित्य प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड के सामने, सीहोर मप्र 466001 ईमेल- shivna.prakashan@gmail.com मूल्य: ₹249.00 पृष्ठ संख्या: 104 प्रकाशन वर्ष: 2025 ख़रीदने के लिंक क्लिक करें: अब मैं बोलूँगी आगे पढ़ें

काग़ज़ की देहरी पर
अपने अस्तित्व को तलाशते लोगों की तर्जुमानी समीक्षित पुस्तक: कागज़ की देहरी पर (नवगीत संग्रह) लेखक: रवि खण्डेलवाल प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा संस्करण: 2024 मूल्य: ₹249.00 पृष्ठ संख्या: 128 ISBN: 978-81-970378-9-4 पुस्तक ख़रीदने का लिंक: कागज़ की देहरी पर आगे पढ़ें

हाइकु का सफ़र वृद्धों की बस्ती की ओर
समीक्षित पुस्तक: अँधेरों का सफ़र (साझा हाइकु संकलन) संपादक: डॉ. सुरंगमा यादव प्रकाशक: अयन प्रकाशन,नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष: 2025 ISBN: 978-93-6423-788-8 मूल्य: ₹320/- पृष्ठ-112, भूमिका: रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ संपादकीय/आलेख: डॉ. सुरंगमा यादव हिंदी हाइकु अब वैश्विक उड़ानें भर रहा है आगे पढ़ें
संस्मरण
अम्माँ के बनाये खाने का स्वाद
महशूर शायर निदा फ़ाज़ली का गोरखपुर में हुआ मुशायरा सुन रही थी। जिसमें माँ पर सुनाया एक शेर दिलो-दिमाग़ पर छा गया। अल्फ़ाज़ थे: खट्टा मीठा माँ का प्यार, या हाथों में स्वाद, हर सब्ज़ी हर दाल में माँ आगे पढ़ें
केन्द्र से परिधि तक: ज़िन्दगी हर दिन नया पाठ पढ़ाती है
मेरी पहली रेल यात्रा: लखनऊ से हरसूद (म.प्र.) जाते हुए ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति का बचपन कष्टों से भरा होता है, उसका बाक़ी जीवन ख़ुशियों से भरा होता है। और जिस व्यक्ति का बचपन ख़ुशियों से आगे पढ़ें
बाढ़ै पुत्र पिता के धरमा
अगर आप किसी को मन से निकालना चाहते हो तो उसे काग़ज़ पर लिख डालिए। यह मेरा अपना अनुभव है। मैंने ऐसी बहुत सी स्मृतियाँ काग़ज़ पर लिखकर मिटाई हैं। इसे मैं मुक्ति समझता हूँ। जीवन में मुक्त होते आगे पढ़ें
नाटक
पुस्तक की आत्महत्या
पात्र: न्यायाधीश (जज साहब), वकील (लेखक), वकील (विपक्ष) मोबाइल, सोशल मीडिया, आई पैड, लेखक, जनता (लेखक, पेन, काग़ज़, पुस्तकें, प्रकाशक) अंक एक (पर्दा खुलता है। न्यायालय के कमरे में जज साहब बैठे हैं। दो अर्दली उनके आस-पास बड़ी आगे पढ़ें
अन्य
यूएसए औेर इसका चरित्र: संपादकीय पर प्रतिक्रिया
संपादकीय शीर्षक: यूएसए औेर इसका चरित्र (साहित्यकुञ्ञ मार्च द्वितीय, 2025) राजनीति चाहे क्षेत्रीय हो अथवा वैश्विक, यदि किसी साहित्यिक पत्रिका का संपादकीय विषयवस्तु बनती है, इसका मतलब वह या तो कुछ सृजनात्मक कर रही है अथवा अपनी हदें पार आगे पढ़ें
कविताएँ
शायरी
समाचार
साहित्य जगत - विदेश

24 वाँ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन नेपाल
भाषा जितना विस्तारित, समृद्धि उतनी ही नेपाली और हिंदी की जननी एक ही संस्कृत हिंदी को मान्यता देने से…
आगे पढ़ें
वरिष्ठ भारतीय भाषाविदों का सम्मान समारोह संपन्न
उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद स्थित लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति केंद्र में गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025 को दोपहर 3…
आगे पढ़ें
इक्कीसवीं सदी का साहित्य विषयक एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी..
इक्कीसवीं सदी का साहित्य चुनौतीपूर्ण साहित्य है: प्रो. आर एस सर्राजु मातृभाषा ही वह माध्यम है जो हमें साहित्य की…
आगे पढ़ेंसाहित्य जगत - भारत

साठोत्तर काव्य आंदोलन में संघर्ष मूलक काव्य की प्रवृत्तियाँ—संगोष्ठी..
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा की वर्चुअल अट्ठारहवीं संगोष्ठी 26 जनवरी-2025 (रविवार) 4…
आगे पढ़ें
ग्रहण काल एवं अन्य कविताएँ का विमोचन संपन्न
उद्वेलन एवं संवेदनाओं की कविताएँ: प्रो. बी.एल. आच्छा सरल शब्दों में गहन विषयों को व्यक्त करना आसान नहीं: गोविंदराजन…
आगे पढ़ें
काव्यांजलि: महिला क्रिश्चियन कॉलेज में भारतीय भाषा दिवस..
महिला क्रिश्चियन कॉलेज ने हाल ही में भारतीय भाषा दिवस मनाया, जो प्रसिद्ध तमिल कवि और स्वतंत्रता सेनानी सुब्रमणिय…
आगे पढ़ेंसाहित्य जगत - भारत

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की रजत जयंती समारोह 2025
हमारी संस्कृति, परंपरा और पहचान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है मातृभाषा: प्रो. पी. राधिका चेन्नई, 21 फरवरी, 2025। “मातृभाषा…
आगे पढ़ें
‘क से कविता’ में अतिथि कवि डॉ. विनय कुमार से संवाद संपन्न
हैदराबाद, 24 जनवरी, 2025। मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के दूरस्थ शिक्षा केंद्र की लाइब्रेरी में ‘क से…
आगे पढ़ें
डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का हुआ लोकार्पण
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली के तत्वावधान में लोकार्पण एवं काव्यपाठ गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी दो चरणों में…
आगे पढ़ें