उड़ने की आशा

01-05-2026

उड़ने की आशा

निर्मल कुमार दे (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

सामने था आकाश
किसी ने कहा था 
सारा आकाश तुम्हारा है
एक किरण-सी जगी थी
दिल में
थी उड़ने की आशा 
बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ
नारी वंदन, नारी स्वाभिमान, 
आत्मनिर्भर नारी का स्लोगन
प्रेरित होकर ठानी थी
बनकर डॉक्टर 
देश, समाज और परिवार का
करुंँगी नाम रोशन
पर, हाय! 
दरिंदों ने नोंच लिए
सारे पंख मेरे
सफ़ेदपोश नर पशुओं ने
ले ली मेरी इज़्ज़त
मेरा यौवन, मेरा सौंदर्य
मेरी अक्षत योनि
सभी लूट लिया दरिंदों ने, 
सत्ता, रुसूख़ और अपराध की
मिली भगत से
मैं आज तड़प रही
मेरा अपराध
बस इतना था
मैं नादान लड़की थी
हॉस्टल में रह कर
नीट की तैयारी में लगी थी। 
उड़ने की आशा मेरी
आज ध्वस्त हो गई। 

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