औरत

निर्मल कुमार दे (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

ज़िन्दगी मेरी
एक पतंग-सी है
दूर आसमान में उड़ती हूँ
कभी इधर कभी उधर 
डोर से बँधी हूँ
स्वाधीन नहीं, 
पराधीन हूँ मैं
अपनी जज़्बात नहीं
नहीं अपनी कोई पसंद
मैं औरत हूँ
पतंग की ज़िन्दगी जीती हूँ। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
सांस्कृतिक कथा
कविता - हाइकु
लघुकथा
कविता - क्षणिका
कविता-सेदोका
कविता-मुक्तक
अनूदित कविता
ललित निबन्ध
ऐतिहासिक
हास्य-व्यंग्य कविता
किशोर साहित्य लघुकथा
सांस्कृतिक आलेख
रचना समीक्षा
ललित कला
साहित्यिक आलेख
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में