सुरभित वसन्त 

01-07-2026

सुरभित वसन्त 

निर्मल कुमार दे (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

पतझड़ बन गई थी ज़िन्दगी
उम्मीदें सब मिट चली थीं 
सारे ग़ैर बन चुके थे
अपनों ने मुँह मोड़ लिया था 
पढ़ा जो संदेश गीता का
बदल गया अंदाज़ जीने का
कर्म है प्रधान जीवन में
नहीं रही अमा की निशा
बदले मौसम बदला रंग
सुरभित हुआ अपना वसन्त। 

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