परोपकार

निर्मल कुमार दे (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

एक कौआ पानी पीने के लिए नदी किनारे आया। चोंच से पानी पीने के बाद उसने देखा कि नदी की तेज़ धारा के साथ एक चींटी बही जा रही है। लाख कोशिश करने के बाद भी चींटी किनारे तक आ पाने में असफल ही हो रही थी। 

कौवे ने चींटी की मदद करनी चाही। उसने एक पत्ते को चोंच से पकड़ा और उसे चींटी के सामने डाल दिया। 

चींटी पत्ते पर जा बैठी। 

कौवे ने फ़ुर्ती से चींटी समेत पत्ते को नदी की धार से उठा लिया और आराम से नदी के सामने एक चट्टान पर रखा। 

चींटी डूबने से बच गई। 

“तुमने मेरी जान बचा ली कौआ भाई!” चींटी ने आभार व्यक्त किया। 

“परोपकार करना सबसे बड़ा धर्म है चींटी बहन। कुछ दिन पहले ही तो तुम्हारे भाइयों और बहनों ने मिलकर हमारे बच्चों को नाग का शिकार होने से बचाया था। इसे कैसे भूल सकता हूँ?” कौवे ने मुस्कुराते हुए कहा। 

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