पेड़ को नई कोंपलों से भरा देख अंकुर चकित हो गया। दस दिन पहले तक पेड़ में एक भी पत्ता नहीं था।

लॉक डॉउन में मुंबई से किसी तरह  गाँव आया था अंकुर ख़ाली हाथ, नौकरी गँवाकर।  तीस वर्षीय अंकुर को अपनी ज़िंदगी बोझ सी लग रही थी। 

प्रकृति के इस सुनहरे बदलाव को देख अंकुर के मन में भी आशा के बीज अंकुरित होने लगे।

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