यथार्थ की ज़मीन पर रागात्मकता का वितान: ‘सारे गीत तुम्हारे'

01-07-2026

यथार्थ की ज़मीन पर रागात्मकता का वितान: ‘सारे गीत तुम्हारे'

अमरेश सिंह भदौरिया (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


कृति: सारे गीत तुम्हारे (गीत-संग्रह) 
कृतिकार: सौरभ शुक्ल 
प्रकाशक: प्रांजल पब्लिकेशन्स, लखनऊ 
मूल्य: ₹200.00

सौरभ शुक्ल का प्रथम गीत-संग्रह ‘सारे गीत तुम्हारे’ समकालीन हिंदी गीत-परंपरा में एक ऐसी ताज़ी और जीवंत बयार की तरह आता है, जो पाठक को कोरे कल्पनाविलास की दुनिया से निकालकर सीधे जीवन के खुरदरे यथार्थ से रूबरू कराता है। इस संग्रह के गीतों से गुज़रते हुए यह साफ़ महसूस होता है कि कवि का अंतस केवल अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों में ही नहीं डूबा है, बल्कि वह अपने आस-पास के समाज, रिसते हुए रिश्तों और टूटते हुए मूल्यों के प्रति भी उतना ही सजग और संवेदनशील है। यही कारण है कि इस कृति के गीत जितने आत्मीय और रागात्मक हैं, उतने ही वे सामाजिक विसंगतियों पर चोट करने वाले और व्यावहारिक भी बन पड़े हैं।

गीतों के भीतर उतरने पर जो सबसे पहला और गहरा प्रभाव पड़ता है, वह है कवि की शृंगारिक तन्मयता। समर्पण के स्तर पर इन गीतों में ग़ज़ब की निश्छलता और पवित्रता है। यहाँ प्रेम केवल मिलन के उल्लास तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें वियोग की एक मर्मस्पर्शी कसक भी है जो पाठक के दिल को भीतर तक छू जाती है। शृंगार के दोनों पक्षों (संयोग और वियोग) को साधते हुए जब कवि अपनी रागात्मक अनुभूतियों का सार्वजनिक आख्यान करता है, तो वैयक्तिक प्रेम का यह उदात्त रूप साधारणीकृत होकर पाठक का अपना बन जाता है:

“मेरे जीवन पर आधारित / जो भी गीत लिखे जाएँगे। उन गीतों के सब चरणों में / केवल नाम तुम्हारा होगा।”

परन्तु इस संग्रह का कवि केवल शृंगार के उपवनों में ही विचरने वाला रचनाकार नहीं हैं। उसका मन समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति के दुख-दर्द को देखकर तड़प उठता हैं। संग्रह के सामाजिक गीतों में जीवन की जद्दोजेहद और ग्रामीण अंचल का अवसाद अत्यंत प्रामाणिक ढंग से उभरकर सामने आया हैं। एक तरफ़ जहाँ काग़ज़ों पर अमीरी और विकास की चकाचौंध दिखाई देती है, वहीं धरातल पर किसान की बदहाली और क़र्ज़ के बोझ तले फँदे से लटकती लाश का जो वीभत्स यथार्थ कवि ने उकेरा है, वह देश के आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य पर एक तीखा प्रहार हैं।

इसी तरह, रोज़ी-रोटी और ज़िम्मेदारियों की ख़ातिर अपने घर-आँगन को छोड़कर महानगरों की अंधी दौड़ में शामिल होने वाले युवाओं की विवशता को भी इन गीतों ने बड़े मार्मिक ढंग से छुआ है। होली जैसे बड़े त्योहारों पर जब गाँव में बूढ़ी माँ या पत्नी राह तकती रह जाती हैं और ‘बुधिया’ शहर से वापस नहीं लौट पाता, तो वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती; बल्कि वह पलायन के दंश को झेलते अनगिनत ग्रामीण परिवारों का एक सजीव और कारुणिक शब्द-चित्र बन जाती है। यह गीत नव-पूँजीवादी दौर में उजड़ते गाँवों और महानगरों के बीच पिसते मज़दूर वर्ग के आंतरिक विलाप को स्वर देता हैं। सामाजिक सरोकार और इस मार्मिक दृश्य को प्रकट करती ये चर्चित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं:

“रोज़ी-रोटी, ज़िम्मेदारी, ने उसको दर-दर भटकाया / अबकी होली में बुधिया फिर, वापस नहीं शहर से आया॥”
पारिवारिक विघटन और रिश्तों के बिखराव के दृश्य भी इस संग्रह में बहुत ही संवेद्यता के साथ उपस्थित हुए हैं। भाई-भाई के बीच होने वाले बँटवारे की जो टीस और पारिवारिक दरारें आज के समाज का कड़वा सच बन चुकी हैं, उन्हें कवि ने अपनी लेखनी से बख़ूबी पकड़ा है। इसके साथ ही, समाज में कन्या भ्रूणहत्या जैसी त्रासद और अमानवीय समस्या पर भी कवि ने बहुत सधा हुआ वार किया हैं। गर्भ में ही मार दी जाने वाली एक अजन्मी बेटी जब अपनी माँ से संवाद करती है और उन दबे हुए राज़ को खोलने की गुहार लगाते हुए सीधे सवाल दागती है, तो पाठक का अंतस पूरी तरह झकझोर जाता हैं। पारिवारिक विघटन और समाज की संवेदनशून्यता को पूरी नग्नता के साथ उजागर करती यह काव्य-पंक्ति मन को उद्वेलित कर देती हैं:

“गर्भहत्या के दबे जो राज़ हैं वो खोलिए / प्रश्न करती हैं अजन्मी आप भी कुछ बोलिए॥”

इन गीतों का शिल्प-विधान और भाषा-सौष्ठव अत्यंत सुबोध और सुरुचिपूर्ण है। आज के इस दौर में जहाँ गीत के नाम पर बहुधा छंदमुक्त अथवा अतुकांत पंक्तियाँ परोसने की होड़ मची है, वहाँ रचनाकार ने पारंपरिक गीतों के आंतरिक अनुशासन और मात्राओं के नियमों का पूरी निष्ठा से निर्वाह किया है। यही कारण है कि इस संग्रह के गीतों में जो स्वाभाविक लय, रवानगी और गेयता है, वह पाठक के अंतस में उतरकर एक अनूठी रागात्मक तरंग पैदा कर देती है। कवि ने अपने गीतों में अंत्यानुप्रास अर्थात् तुकबंदी का बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक संयोजन किया है। इसका एक सुंदर उदाहरण तब देखने को मिलता है, जब कवि ‘अधूरे’ और ‘पूरे’ जैसे आम शब्दों के साथ अपनी माटी के ‘घूरे’ जैसे अनगढ़ परन्तु सजीव आंचलिक शब्द को पूरी सहजता से पिरो देता हैं। यह प्रयोग दर्शाता हैं कि कवि अपनी भाषाई जड़ों से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ हैं।

भाषा के धरातल पर भी यह संग्रह किसी कृत्रिम आडंबर का शिकार नहीं हैं, बल्कि यह पूरी तरह से जनसामान्य की चेतना के निकट हैं। कवि ने जहाँ एक ओर सरल और गरिमापूर्ण शब्दावली का सुंदर उपयोग किया हैं, वहीं दूसरी ओर लोक-व्यवहार में रची-बसी उर्दू और ठेठ आंचलिक शब्दों जैसे—नोन, तेल, लकड़ी, बखारी आदि का भी उन्मुक्त प्रयोग किया है। भाषा का यही भोलापन, सहज आत्मीयता और सीधापन गीतों की संप्रेषणीयता को कई गुना बढ़ा देता है। शब्द-चयन का यही सलीक़ा कविता में उभरने वाले हर एक बिम्ब और दृश्य को पाठक के सम्मुख सजीव कर देता है, जिससे काव्य का मर्म सीधे हृदय को स्पर्श कर लेता है।

एक गंभीर समीक्षक के तौर पर यदि कृति के व्याकरणिक और भाषाई पक्ष का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया जाए, तो कुछ स्थलों पर युवा रचनाकार से अनजाने में व्याकरणिक त्रुटियाँ भी हुई हैं। समीक्षा की प्रामाणिकता को पुष्ट करने के लिए उन गीतों के मुखड़ों और पंक्तियों का संदर्भ लेना आवश्यक हो जाता है।

पहली भाषाई त्रुटि संग्रह के एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और बहुचर्चित गीत ‘नहीं हालत सुधारी’ में दिखाई देती है, जिसकी पंक्ति हैं:

“आज फँदे से लटकती लाश पायी, दे नहीं पाया मुझे लगता उधारी।”

यहाँ व्यावहारिक और व्याकरणिक दृष्टि से ‘उधारी’ शब्द के प्रयोग में लिंग संबंधी अशुद्धि दिखाई देती हैं। हिंदी व्याकरण के नियम के अनुसार ‘उधार’ शब्द मूलतः पुल्लिंग है (जैसे-उधार देना, उधार चुकाना), जबकि लोक-व्यवहार में कई बार इसे भाववाचक संज्ञा की तरह ‘उधारी’ (स्त्रीलिंग) बना दिया जाता है। यदि इसे ‘उधारी’ (स्त्रीलिंग) मानकर भी पढ़ा जाए, तो क्रिया ‘दे नहीं पाया’ (पुल्लिंग) के साथ इसका तालमेल अशुद्ध हो जाता है। नियमतः यहाँ या तो “दे नहीं पाया मुझे लगता उधार” (पुल्लिंग के साथ पुल्लिंग क्रिया) होना चाहिए था, या फिर “दे नहीं पाई मुझे लगता उधारी” (स्त्रीलिंग क्रिया) होना चाहिए था। कवि ने ‘लाचारी’ या ‘बीमारी’ जैसे शब्दों से तुक मिलाने के चक्कर में यहाँ पुल्लिंग क्रिया के साथ ‘उधारी’ शब्द का दोषपूर्ण प्रयोग कर दिया है, जो व्याकरणिक रूप से खटकता हैं।

इसके अतिरिक्त, संग्रह के विरह-प्रधान गीतों में भी अंत्यानुप्रास (तुकबंदी) और मात्रा-भार के दबाव में आकर व्याकरणिक त्रुटियाँ हुई हैं। उदाहरण के लिए, ‘ताना’ शब्द व्याकरण के नियम से ‘मारना’ या ‘देना’ क्रिया के साथ प्रयुक्त होता हैं (जैसे, “ताना मार रहे हैं”), किन्तु गीत में इसके साथ ‘सुनाना’ क्रिया (“साक्ष्य देकर सुनायें न ताना सभी“) का प्रयोग हुआ हैं जो व्याकरण के हिसाब से थोड़ा अजीब है। लय बनाए रखने के लिए इसे “साक्ष्य देकर कहीं मारें न ताना सभी” या “साक्ष्य देकर हमें कोसें न तारे सभी” जैसा कुछ किया जा सकता है, जिससे ‘ताना’ शब्द क्रिया के साथ सही बैठे। साथ ही, ‘पाप-अग्नि’ जैसे तत्सम शब्द के साथ ‘जरूँ’ जैसे आंचलिक क्रिया-रूप का प्रयोग भाषा के अद्वैत को आंशिक रूप से प्रभावित करता है। चूँकि गीतकार आंचलिक और व्यावहारिक लोकभाषा को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बना रहा है, इसलिए कहीं-कहीं लोक-प्रचलन के प्रभाव में आकर लिंग, वचन या वर्तनी का यह घालमेल हुआ हैं। छंदबद्ध रचनाओं में मात्राओं की संख्या बराबर करने और तुकबंदी मिलाने की विवशता के कारण अक़्सर रचनाकारों से ऐसी चूक हो जाती हैं, जिसे आगामी संस्करणों या भविष्य के लेखन में सजगतापूर्वक सुधारा जा सकता हैं। कवि की यह भाषाई असावधानी उनके कथ्य की सघनता को कम नहीं करती, बल्कि आगामी सृजन के लिए परिष्कार की माँग करती हैं।

व्याकरणिक असंगति का एक और रूप वहाँ दिखाई देता हैं, जहाँ वचन और आदरसूचक क्रियाओं का संतुलन सही नहीं बैठ रहा है। विशेष रूप से कई गीतों में एक ही अंतरे या पंक्ति में प्रेमी अथवा पात्र के लिए ‘तुम’ (मध्यम पुरुष) और ‘आप’ (आदरसूचक) दोनों सर्वनामों का प्रयोग एक साथ कर दिया गया हैं, जो सर्वनाम दोष के अंतर्गत आता है। काव्य-प्रवाह में किसी एक ही भाव को अंत तक रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, “साकल्य सा महका सकोगे” गीत की पंक्ति—“किन्तु मुझको दुःख यही क्यों, आपका मैं हो न पाया? . . . याद में डूबूँ तुम्हारी“—में ‘आपका’ और ‘तुम्हारी’ का एक साथ प्रयोग खटकता है; यहाँ या तो ‘तुम्हारा’ होना चाहिए था या ‘आपकी'। इसी तरह ‘साधना’ गीत में—“साधना के लिए आप आये मगर . . . आपका प्रेम पल-भर हमें मिल सके . . . व्यर्थ में फिर हमें तुम बुलाते रहे“—लिखा गया है, जहाँ ‘आप’ से सीधे ‘तुम’ पर आ जाना व्याकरण और भाव के सहज प्रवाह को तोड़ता है।

इसी तरह, वाक्य-रचना और शब्दों के चयन के स्तर पर भी कुछ कमियाँ खटकती हैं। जैसे—“भूल हुई मिट्टी की प्रतिमा . . .”—रचना की पंक्तियों को देखें, तो यहाँ प्रयुक्त ‘कौशलता’ शब्द व्याकरण के नियमों पर खरा नहीं उतरता। नियम यह हैं कि ‘कुशल’ शब्द में ‘ता’ प्रत्यय लगाने से ‘कुशलता’ बनता है, या फिर ‘कौशल’ शब्द अपने आप में ही भाववाचक संज्ञा है। ऐसे में ‘कौशल’ के साथ दोबारा ‘ता’ प्रत्यय जोड़ना भाषा की अशुद्धि है। कविता के प्रवाह और छंद की लय को बनाए रखने के लिए यहाँ ‘कौशलता’ की जगह ‘रण-कौशल’ शब्द का प्रयोग कहीं अधिक सटीक और सुंदर रहेगा। वहीं, क्रिया और वचन के असंतुलन को देखें तो “प्रश्न ही तो दुखों से उबारे रहे” में ‘उबारे रहे’ के स्थान पर ‘उबारते रहे’ का प्रयोग उचित होता, क्योंकि यह कार्य की निरंतरता को दर्शाता है। व्याकरण के साथ-साथ शब्दों के सही रूपांतरण और वर्तनी पर भी ध्यान देना आवश्यक हैं। प्रथम गीत में प्रयुक्त ‘प्रियभाषिनि’ का शुद्ध तत्सम रूप ‘प्रियभाषिणी’ होता है। इसी प्रकार, “एक संतति के लिए निरबंसनी मैं हो गयी” पंक्ति में प्रयुक्त ‘निरबंसनी’ शब्द लोकभाषा का हैं। यदि इसे कविता के स्तर पर थोड़ा और परिमार्जित करना हो, तो ‘निर्वंश’ या ‘निःसंतान’ का प्रयोग बेहतर होता; और यदि गीत के छंद के विन्यास के लिए इसे रखना अनिवार्य हो, तो इसकी शुद्ध वर्तनी ‘निरबंसिनी’ होनी चाहिए।

प्रस्तुतीकरण और मूल्यांकन के प्रतिमानों पर इस कृति का मुख्य पृष्ठ अत्यंत सुविचारित, सुव्यवस्थित और प्रभावी प्रतीत होता है। आवरण पृष्ठ पर अंकित वरिष्ठ समीक्षकों, शिक्षाविदों और कवियों के अभिमत केवल प्रशंसा मात्र नहीं हैं, बल्कि वे युवा गीतकार सौरभ शुक्ल के ‘मानस-संसार’ और ‘यथार्थ-धरातल’ की सूक्ष्म साहित्यिक विवेचना करते हैं। तकनीकी और आलोचनात्मक आलोक में, यह पृष्ठ किसी भी प्रकार की कृत्रिम तड़क-भड़क से मुक्त हैं और इसमें शुद्ध दृश्य-विन्यास के माध्यम से पाठकीय जिज्ञासा को जागृत करने की अद्भुत क्षमता है। संक्षेप में, यह मुख्य पृष्ठ अपनी साहित्यिक प्रामाणिकता और उच्च स्तरीय प्रस्तुति के कारण संपूर्ण कार्य को एक गरिमामय विस्तार देता है।

एक मुकम्मल मूल्यांकन के तौर पर देखें तो यह कृति गीत-साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यद्यपि कुछ स्थानों पर विरह, टूटन, सिन्दूर या शहनाई जैसे पारंपरिक उपमानों और विषयों का दोहराव खटकता है, और कुछ सामाजिक गीतों में अपनी बात कहने या संदेश देने की व्याकुलता के कारण शिल्प-पक्ष किंचित शिथिल पड़ता हुआ सा प्रतीत होता हैं, फिर भी एक समग्र रचना के रूप में यह प्रयास अत्यंत सराहनीय और प्रौढ़ है। नए दौर के रचनाकार से जहाँ और अधिक नवीन प्रतीकों की उम्मीद बनी रहती हैं, वहीं पिता के प्रति सम्मान, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक सरोकारों का जो ताना-बाना इन गीतों में बुना गया हैं, वह अंततः पाठक और श्रोता को अपना बना लेने में पूरी तरह सफल रहता है। यह संग्रह हिंदी गीत-परंपरा के उज्ज्वल भविष्य की ओर एक मज़बूत क़दम है।

—अमरेश सिंह भदौरिया
 

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