पहाड़ बुलाते हैं

15-09-2025

पहाड़ बुलाते हैं

अमरेश सिंह भदौरिया (अंक: 284, सितम्बर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

पहाड़ बुलाते हैं—
क्योंकि जीवन की समतलता
एक भ्रम है, 
और ऊँचाई तक पहुँचना
एक आंतरिक अन्वेषण। 
 
वे पुकारते हैं . . . 
जब आत्मा अपने ही बोझ से दबी
उत्तर की खोज में भटकती है। 
जब प्रश्नों की भीड़ में
मन मौन चाहता है। 
 
पहाड़ जानते हैं—
कि ऊँचाई सिर्फ़ चढ़ाई नहीं, 
त्याग है . . . 
हर उस बँधन का, 
जो हमें ज़मीन से जोड़े रखता है। 
 
हर शिखर पर खड़ा व्यक्ति
भीतर उतरता है—
क्योंकि सबसे ऊँचे बिंदु पर
मनुष्य अकेला नहीं, 
सबसे अधिक अपने पास होता है। 
 
पहाड़ सिखाते हैं—
कि स्थिरता भी एक यात्रा है, 
और मौन वह संवाद, 
जो शब्दों की पराजय के बाद शुरू होता है। 
 
पहाड़ बुलाते हैं—
उनसे मिलने नहीं, 
बल्कि
ख़ुद से मिलवाने के लिए। 
 
जहाँ गूँजता है—
एक अदृश्य संवाद, 
कि तुम वही हो
जिसे तुम खोजते रहे। 

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