ग्रहण
अमरेश सिंह भदौरिया
जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा, अथवा सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है, तब प्रकाश आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध हो जाता है। खगोल विज्ञान में इस घटना को ‘ग्रहण’ कहा जाता है।
मनुष्य का जीवन भी किसी आकाश से कम नहीं होता।
उसमें भी अपने-अपने सूर्य होते हैं।
विश्वास के।
प्रेम के।
विचार के।
दो चेतनाएँ जब एक-दूसरे की परिक्रमा करने लगती हैं, तो उनके बीच एक उजाला जन्म लेता है।
वह उजाला केवल भावना का नहीं होता, वह दृष्टि का भी होता है।
पर समय के किसी अनदेखे मोड़ पर,
कोई तीसरी शक्ति प्रवेश करती है।
कभी वह सुविधा के रूप में आती है।
कभी भय के रूप में।
कभी सुरक्षा के वादे के साथ।
वह सीधे प्रकाश को नहीं बुझाती।
बस बीच में आ खड़ी होती है।
और तब धीरे-धीरे
विचार का सूर्य धुँधला पड़ने लगता है।
प्रेम की परिधि बदलने लगती है।
और संबंधों के आकाश में
एक अदृश्य ग्रहण उतर आता है।
शहर का वह पुराना इलाक़ा अब मानो समय से बाहर छूट गया था।
तंग गलियाँ, जिनमें दो मोटरसाइकिलें आमने-सामने आ जाएँ तो एक को रुकना पड़ता।
बरसात के पानी से काली पड़ी दीवारें।
सीलन की गंध जो हर मौसम में बनी रहती।
दीवारों पर चिपके पुराने पोस्टर आधे उखड़ चुके थे।
कहीं मज़दूर एकता के नारे।
कहीं बीते आंदोलनों की तारीख़ें।
लाल रंग की स्याही अब फीकी पड़ चुकी थी, जैसे शब्दों का ताप भी कम हो गया हो।
गली के मोड़ पर वही पुरानी चाय की दुकान थी।
कुछ प्लास्टिक की कुर्सियाँ।
एक लकड़ी की बेंच।
यहीं बहसें होतीं।
यहीं सपने बुने जाते।
इन्हीं गलियों के बीच,
इन्हीं पोस्टरों की छाया में,
सुजाता और रंजीत का संसार बसता था।
रंजीत जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे का पूर्णकालिक कार्यकर्ता था।
सुबह फ़ैक्ट्री गेट पर पर्चे बाँटता।
दोपहर को मज़दूर बस्तियों में बैठक करता।
शाम को नुक्कड़ नाटक।
रात को अगली रणनीति।
जेब ख़ाली रहती।
पर शब्दों में आग थी।
सुजाता म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ाती थी।
बच्चों के पैरों में चप्पल नहीं होती।
कॉपियाँ अधूरी होतीं।
मिड-डे मील ही कई बच्चों का एकमात्र भोजन होता।
वह घर लौटकर रंजीत के लिए पर्चे टाइप करती।
तनख़्वाह का हिस्सा आंदोलन में लगाती।
दोनों शाम को चाय की दुकान पर मिलते।
वहाँ अक्सर चर्चा होती।
कार्ल मार्क्स की वर्ग-चेतना।
मैक्सिम गोर्की के श्रमिक पात्र।
गजानन माधव मुक्तिबोध की बेचैन कविता।
रंजीत कहता, “प्रेम भी प्रतिरोध है। हम निजी स्वार्थ के ख़िलाफ़ खड़े हैं।”
सुजाता मुस्कुराती।
उसे लगता, वे सचमुच इतिहास बदल देंगे।
धीरे-धीरे शहर बदलने लगा।
पास की पुरानी कपड़ा मिल बंद हो गई।
सैकड़ों मज़दूर बेरोज़गार हो गए।
बस्ती में उधार बढ़ गया।
कई घरों में चूल्हा कई-कई दिन ठंडा रहने लगा।
रंजीत ने धरना आयोजित किया।
सुजाता ने शिक्षकों से समर्थन जुटाया।
कुछ दिन तक अख़बारों में ख़बर छपी।
फिर सब शांत हो गया।
इसी बीच सुजाता के पिता बीमार पड़े।
पहले हल्की थकान समझी गई।
फिर सीने में दर्द बढ़ने लगा।
एक रात अचानक साँस फूलने लगी।
सुबह उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया।
ओपीडी के बाहर लंबी क़तार थी।
बुज़ुर्ग बेंचों पर टिके थे।
कुछ लोग फ़र्श पर बैठे थे।
नर्स बार-बार पर्ची बनाने का इशारा कर रही थी।
तीन घंटे बाद नंबर आया।
डॉक्टर ने मुश्किल से पाँच मिनट दिए।
स्टेथोस्कोप लगाया।
दो-तीन सवाल पूछे।
कुछ जाँचें लिख दीं।
अगले मरीज़ को बुला लिया।
जाँच कक्ष के बाहर फिर लाइन थी।
मशीन ख़राब होने की सूचना लगी थी।
कुछ टेस्ट बाहर कराने की सलाह दी गई।
पास ही एक काउंटर पर सरकार की आयुष्मान कार्ड योजना का बोर्ड लगा था।
कई लोग अपने कार्ड हाथ में लिए खड़े थे।
उम्मीद थी कि इलाज का ख़र्च कुछ कम हो जाएगा।
लेकिन काउंटर पर बैठे कर्मचारी बार-बार नई शर्तें बता रहे थे।
कभी काग़ज़ अधूरे बताए जाते।
कभी कहा जाता कि यह बीमारी योजना में शामिल नहीं है।
कभी मशीन बंद होने का बहाना मिल जाता।
कई मरीज़ झुँझलाकर लौट रहे थे।
कई लोग चुपचाप निजी जाँच कराने बाहर जा रहे थे।
कार्ड जेब में था, पर लाभ काग़ज़ों में अटका हुआ था।
सुजाता ने भी पूछताछ की।
पर उसे लंबी प्रक्रिया और कई हस्ताक्षरों की बात बताई गई।
पिता की हालत देखकर उसने बहस नहीं की।
दवाइयाँ अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं।
फार्मेसी वाले ने सूची पकड़ाई।
बिल उम्मीद से कहीं ज़्यादा निकला।
सुजाता ने पर्स खोला।
राशि कम थी।
बाक़ी पैसे उधार लिखवाने पड़े।
वापसी में ऑटो का किराया भी सोच-समझकर देना पड़ा।
घर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई।
पिता ख़ामोश थे।
माँ की आँखों में चिंता ठहर गई थी।
उस दिन सुजाता ने पहली बार महसूस किया कि बीमारी केवल शरीर को नहीं तोड़ती।
वह पूरे घर की आर्थिक रीढ़ पर चोट करती है।
छोटे भाई की कॉलेज फ़ीस तीन महीने से बाक़ी थी।
कॉलेज प्रशासन ने अंतिम नोटिस दे दिया था।
कहा गया था कि निर्धारित तिथि तक शुल्क न जमा हुआ तो परीक्षा फ़ॉर्म स्वीकार नहीं होगा।
सुजाता उसे लेकर बैंक गई।
शिक्षा ऋण की जानकारी ली।
फ़ॉर्म भरा गया।
आय प्रमाण पत्र माँगा गया।
स्थायी नौकरी का विवरण माँगा गया।
फिर एक गारंटर की शर्त रख दी गई।
घर में कोई स्थायी सम्पत्ति नहीं थी।
न ज़मीन का काग़ज़।
न बैंक बैलेंस।
मैनेजर ने विनम्रता से कहा,
“नियम सबके लिए समान हैं।”
वे लौट आए।
घर का बजट बिगड़ चुका था।
राशन उधार आने लगा।
दूध वाला हिसाब याद दिलाने लगा।
दवाइयों और फ़ीस के बीच चयन करना पड़ रहा था।
माँ पहले चुपचाप ख़र्च का हिसाब रखती थीं।
अब अक्सर पर्ची हाथ में लिए देर तक बैठी रहतीं।
उनकी आँखों में चिंता स्थायी छाया की तरह बस गई थी।
बात-बात पर आह निकल जाती।
एक रात अचानक बिजली चली गई।
इन्वर्टर भी जवाब दे चुका था।
अँधेरे में सिर्फ़ सड़क की हल्की रोशनी खिड़की से छनकर आ रही थी।
पिता की खाँसी बार-बार गूँज रही थी।
बीच-बीच में उनकी साँस अटक जाती।
माँ पानी का गिलास पकड़ातीं।
भाई चुपचाप किताब खोले बैठा था, पर पढ़ नहीं पा रहा था।
सुजाता खिड़की के पास खड़ी थी।
मोबाइल की हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
उसने धीमे स्वर में कहा,
“रंजीत, क्या संघर्ष हमेशा इतना लंबा होता है। क्या हर पीढ़ी को इसी तरह इंतज़ार करना पड़ता है?”
रंजीत कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला,
“हर बदलाव समय लेता है। हमें डटे रहना होगा। अगर हम हार मान लेंगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा।”
उसकी बात में तर्क था।
विश्वास भी था।
पर उस अँधेरे कमरे में,
दवाइयों की गंध और खाँसी की आवाज़ के बीच,
वह उत्तर अधूरा-सा लगा।
सिद्धांत सही थे।
पर परिस्थिति कठोर थी।
इसी दौरान विकास आया।
पहले एक औपचारिक मुलाक़ात के रूप में।
फिर एक नियमित उपस्थिति की तरह।
साफ़-सुथरा व्यक्तित्व।
संतुलित, नपा-तुला स्वर।
कलाई में चमकती घड़ी।
बाहर खड़ी महँगी कार, जो उस गली में अलग ही दिखाई देती थी।
वह सुजाता के पिता के पुराने मित्र का बेटा था।
कई वर्षों से बाहर था।
विदेश से प्रबंधन की पढ़ाई कर लौटा था।
एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत।
उसकी भाषा में आत्मविश्वास था, और निर्णय लेने की सहजता।
जब उसे पिता की बीमारी का पता चला, वह सीधे घर पहुँचा।
रिपोर्ट देखीं।
किसी परिचित हृदय-विशेषज्ञ को फोन किया।
अगले ही दिन निजी अस्पताल में अपॉइंटमेंट तय हो गया।
वह स्वयं उन्हें लेकर गया।
लंबी क़तारें नहीं थीं।
डॉक्टर ने विस्तार से जाँच की।
नई दवाइयाँ लिखीं।
अस्पताल का बिल उसने बिना हिचक चुका दिया।
सुजाता ने धीमे से विरोध करना चाहा।
विकास ने मुस्कुराकर कहा,
“अभी बहस का समय नहीं है। पहले स्वास्थ्य।”
वापसी में उसने कहा,
“सरकारी तंत्र अपनी जगह है, पर जब तत्काल ज़रूरत हो तो विकल्प ढूँढ़ने पड़ते हैं। व्यवस्था बदलने में समय लगता है।”
यह वाक्य तटस्थ था।
पर उसका प्रभाव गहरा।
घर में कई दिनों बाद सुकून दिखा।
माँ ने पहली बार खुलकर धन्यवाद कहा।
पिता के चेहरे पर भी राहत थी।
धीरे-धीरे विकास का आना-जाना नियमित हो गया।
वह कभी फल ले आता।
कभी दवाइयों का स्टॉक देख लेता।
कभी बैंक से जुड़ी सलाह देता।
उसने सुजाता के भाई का बायोडाटा ठीक करवाया।
अपने परिचित के दफ़्तर में उसे प्रशिक्षु के रूप में लगवा दिया।
काम छोटा था, पर महीने के अंत में कुछ निश्चित मानदेय मिलने लगा।
लड़के के चेहरे पर धीरे-धीरे आत्मविश्वास लौटने लगा।
एक दिन उसने माँ के हाथ में स्वास्थ्य बीमा का फ़ॉर्म रखा।
प्रीमियम की राशि समझाई।
भविष्य की सुरक्षा की बात की।
बरसात में छत टपकने लगी तो उसने अपने ठेकेदार को भेज दिया।
दो दिन में मरम्मत हो गई।
गली के लोग हैरानी से देखते रहे।
अब घर में चर्चा बदलने लगी थी।
बीमारी और क़र्ज़ की जगह योजनाओं और सम्भावनाओं की बातें होने लगीं।
राहत धीरे-धीरे आदत में बदल रही थी।
और उसी के साथ, बिना शोर किए,
एक नई उपस्थिति घर के भीतर स्थिर हो रही थी।
उधर रंजीत की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं।
फ़ैक्ट्री गेट पर दिए गए एक भाषण को “उकसावे” का नाम देकर उसके ख़िलाफ़ एक और मुक़द्दमा दर्ज कर दिया गया।
आरोप था कि उसने श्रमिकों को प्रबंधन के विरुद्ध भड़काया।
पुलिस नोटिस घर तक आ पहुँचा।
थाने के चक्कर बढ़ गए।
कभी बयान।
कभी काग़ज़।
कभी ज़मानत की औपचारिकताएँ।
साथियों की संख्या भी घट रही थी।
कुछ लोग समझौता कर चुके थे।
कुछ ने दूसरी नौकरियाँ पकड़ ली थीं।
संघर्ष अब पहले जितना भीड़ भरा नहीं था।
इधर एक और झटका लगा।
एक दिन सुजाता स्कूल से लौटी तो स्टाफ़ रूम में असामान्य सन्नाटा था।
नोटिस बोर्ड पर सूचना चिपकी थी।
स्कूल को एक निजी ट्रस्ट को सौंपा जा रहा था।
“संरचनात्मक सुधार” के नाम पर पुनर्नियुक्ति होगी।
सूची लगी थी।
कई नामों के आगे लाल निशान थे।
उसका नाम भी उनमें था।
कारण लिखा था—“अतिरिक्त पद।”
वह काग़ज़ देर तक देखती रही।
सहकर्मियों की आँखों में भय था।
कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
घर आकर वह चुपचाप बैठ गई।
न पिता से बात की।
न माँ से।
सिर्फ़ पर्स से वह नोटिस निकालकर मेज़ पर रख दिया।
शाम को विकास आया।
उसने काग़ज़ पढ़ा।
कुछ क्षण सोचा।
फिर शांत स्वर में कहा,
“ऐसी स्थितियाँ अब सामान्य हो रही हैं। अगर आप चाहें तो हमारे कॉर्पोरेट स्कूल में आवेदन कर सकती हैं। वेतन दोगुना होगा। सुविधाएँ अलग।”
वाक्य सरल था।
पर उसमें समाधान का वादा था।
तभी दरवाज़ा खुला।
रंजीत अंदर आया।
चेहरे पर थकान थी।
हाथ में ज़मानत के काग़ज़ थे।
अदालत से सीधे आया था।
कमरे में तीनों आमने-सामने थे।
मेज़ पर छँटनी का नोटिस।
हाथ में ज़मानत का काग़ज़।
और सामने सुरक्षित नौकरी का प्रस्ताव।
रंजीत ने काग़ज़ उठाया।
एक नज़र पढ़ा।
फिर कहा,
“यह निजीकरण ही तो समस्या है। शिक्षा को बाज़ार बना दिया गया है। यही तो हम रोकना चाहते हैं।”
विकास ने संयम से उत्तर दिया,
“समस्या से इंकार नहीं है। पर जब व्यवस्था बदलने में वर्षों लगें, तब व्यक्ति क्या करे। क्या वह अपने परिवार को असुरक्षा में रखे। क्या हर त्याग अनिवार्य है?”
रंजीत ने तीखे स्वर में कहा,
“समझौते से परिवर्तन नहीं आता।”
विकास ने उतने ही शांत स्वर में कहा,
“और ख़ाली नारों से रोटी नहीं आती।”
कमरे में हवा भारी हो गई।
सुजाता दोनों को देखती रही।
एक ओर संघर्ष।
दूसरी ओर स्थायित्व।
एक ओर मुक़द्दमे।
दूसरी ओर नियुक्ति-पत्र की सम्भावना।
उस रात वह छत पर गई।
बस्ती की ओर देखा।
कई घरों में ताले लगे थे।
कुछ परिवार गाँव लौट चुके थे।
एक ओर पुरानी मिल का जंग लगा फाटक था।
दूसरी ओर नए मॉल के निर्माण का बोर्ड चमक रहा था।
उसे लगा, परिवर्तन उसकी इच्छा से नहीं, समय की दिशा से चल रहा है।
और वह बीच में खड़ी है।
दिन बीते।
विकास का आना-जाना बढ़ा।
घरवालों का विश्वास भी।
आख़िरकार रिश्ता आगे बढ़ा।
परिवार ने सहमति दे दी।
निर्णय लगभग तय था।
जब रंजीत को यह पता चला, वह सीधे उसके सामने खड़ा था।
चेहरा शांत था, पर आँखों में थकान थी।
“क्या यह तुम्हारा निर्णय है?” उसने पूछा।
सुजाता ने धीमे स्वर में कहा,
“मैंने संघर्ष को समझा है। पर हर लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जाती। मैं थक गई हूँ। मुझे अपने परिवार को बचाना है।”
रंजीत ने पूछा,
“और जो व्यवस्था हमें तोड़ रही है?”
सुजाता ने आँखें झुका लीं।
कोई उत्तर नहीं दिया।
उसकी ख़ामोशी ही उत्तर थी।
कुछ सप्ताह बाद विवाह हो गया।
पुराने महल्ले में पहली बार एक नई कार नियमित खड़ी दिखने लगी।
घर में ऐसी लग गया।
पिता का इलाज व्यवस्थित होने लगा।
भाई की नौकरी स्थायी हो गई।
बस्ती वैसी ही थी।
पर उस घर की स्थिति बदल चुकी थी।
रंजीत फिर उसी चाय की दुकान पर बैठा था।
चाय पहले जैसी ही थी।
पर साथ में बैठने वाली कुर्सी ख़ाली थी।
बस्ती में एक और छोटी फ़ैक्ट्री बंद होने की ख़बर थी।
नए मॉल का ढाँचा ऊपर उठ चुका था।
उसे लगा, यह केवल उसकी निजी पराजय नहीं है।
यह समय का संकेत है।
एक विचार पर छाया का फैलना।
ग्रहण लगा है।
पर हर ग्रहण अस्थायी होता है।
उसने अगली सभा की घोषणा की।
लोग कम थे।
आवाज़ थोड़ी थकी हुई थी।
पर टूटी नहीं थी।
आसमान में बादल थे।
पर उसे विश्वास था—
सूरज पूरी तरह बुझता नहीं।
वह लौटता है।
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