समय के आईने में सनातन
अमरेश सिंह भदौरिया
आज का समाज तीव्र गति से बदल रहा है, पर इस परिवर्तन के साथ एक गहरी बेचैनी भी जन्म ले रही है। धर्म, परंपरा और संस्कृति जैसे शब्द सार्वजनिक विमर्श में या तो अत्यधिक आक्रामक हो गए हैं या पूरी तरह उपेक्षित। ‘सनातन’ भी इसी द्वंद्व का शिकार है—कभी इसे आधुनिक सोच के विरोध में खड़ा किया जाता है, तो कभी इसे पहचान की राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है। इस शोरगुल में सनातन का मूल स्वर कहीं दब गया है, जो न तो टकराव सिखाता है और न ही पलायन, बल्कि संतुलन की बात करता है।
वर्तमान समय की सबसे बड़ी बहस धर्म और विज्ञान के बीच खींची जा रही रेखा है। एक ओर विज्ञान को प्रगति का पर्याय माना जा रहा है, दूसरी ओर धर्म को पिछड़ेपन का। किन्तु जीवन का अनुभव बताता है कि मनुष्य केवल तर्क से नहीं जीता, और न ही केवल आस्था से। सनातन दृष्टि इसी बीच की भूमि पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ प्रश्न पूछना वर्जित नहीं और विश्वास अंधा नहीं। उपनिषदों के संवाद हों या जीवन की दैनिक नैतिकताएँ—यह परंपरा विवेक को दबाती नहीं, बल्कि जाग्रत करती है।
आज की युवा पीढ़ी असमंजस में है। एक ओर तेज़ उपभोगवादी संस्कृति है, दूसरी ओर भीतर ख़ालीपन। तकनीक ने सुविधाएँ दी हैं, पर शान्ति नहीं। इस संदर्भ में सनातन का जीवन-दर्शन किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि अनुभव की तरह सामने आता है। वह यह नहीं कहता कि इच्छाएँ छोड़ दो, बल्कि यह सिखाता है कि इच्छाओं पर नियंत्रण आवश्यक है। संयम यहाँ नैतिकता का बोझ नहीं, मानसिक संतुलन की शर्त है।
धर्म के नाम पर बढ़ता सामाजिक ध्रुवीकरण भी हमारी सबसे बड़ी चिंता है। पहचान के प्रश्न इतने तीखे हो गए हैं कि मनुष्य मनुष्य से दूर होता जा रहा है। सनातन परंपरा इस विभाजन को स्वीकार नहीं करती। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ कोई नारा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार है। यह विचार मनुष्य को जाति, वर्ग और संप्रदाय से ऊपर उठाकर मानव मात्र से जोड़ता है। आज जब समाज खाँचों में बँट रहा है, तब यह दृष्टि अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
पर्यावरण संकट पर होने वाली वैश्विक चर्चाएँ भी हमें आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं। विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन अब विनाश का रूप ले चुका है। सनातन ने कभी प्रकृति को भोग की वस्तु नहीं माना। नदियों, वृक्षों और जीवों के प्रति सम्मान कोई अंध आस्था नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जीवन-बोध था। आज जब हम प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं, तब यह समझ किसी धार्मिक आग्रह से अधिक मानवीय आवश्यकता बन चुकी है।
कर्म के सिद्धांत को भी आज के संदर्भ में नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। यह भाग्यवाद को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि उत्तरदायित्व की भावना पैदा करता है। समाज में बढ़ती असहिष्णुता, हिंसा और नैतिक पतन के बीच यह स्मरण आवश्यक है कि प्रत्येक आचरण का प्रभाव समाज पर पड़ता है। यह समझ व्यक्ति को केवल अधिकारों की नहीं, कर्त्तव्यों की भी याद दिलाती है।
आज की बहसों में एक ख़तरा यह भी है कि परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया गया है। जबकि सनातन परंपरा स्वयं परिवर्तनशील रही है। उसने समय के साथ प्रश्न स्वीकार किए, व्याख्याएँ बदलीं और नए संदर्भों को स्थान दिया। यही कारण है कि वह आज भी जीवित है। परंपरा यदि जड़ हो जाए, तो बोझ बन जाती है; और आधुनिकता यदि मूल्यों से कट जाए, तो खोखली।
अंततः आवश्यकता इस बात की है कि सनातन को न तो राजनीतिक हथियार बनाया जाए और न ही संग्रहालय की वस्तु। इसे जीवन की कसौटी पर परखा जाए। यदि कोई विचार मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक संतुलित और अधिक उत्तरदायी बनाता है, तो वह आज भी उपयोगी है।
सनातन का सार यही है—टकराव नहीं, समन्वय; शोर नहीं, समझ; और उपदेश नहीं, अनुभूत जीवन। आज के समय में यही इसकी सबसे बड़ी समकालीन प्रासंगिकता है।
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