प्रेम का प्रतिदान
अमरेश सिंह भदौरिया
गाँव की सुबह किसी काव्य-पंक्ति की तरह मृदुल और सुव्यवस्थित नहीं होती थी; वह श्रम और आवश्यकता की ठोस आहटों से खुलती थी। पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैलते ही हर घर में हरकत शुरू हो जाती। कुएँ पर औरतों की क़तार लग जाती—रस्सी के पुल्ली से रगड़ खाने की कर्कश आवाज़, बाल्टी के पानी में गिरने की छपाक, और फिर भरे घड़ों को सिर पर सँभालती हुई थकी, पर अभ्यस्त चाल।
इधर कच्चे आँगनों में चूल्हे सुलगते। अधपकी लकड़ियों से उठता धुआँ पहले आँखों में चुभता, फिर हवा में घुल जाता। बच्चे उनींदी आँखें मलते बाहर निकलते—किसी के हाथ में मवेशियों की रस्सी, किसी के हाथ में स्कूल की पुरानी कॉपी।
गली से दूधिए की साइकिल छनछनाती गुज़रती। पीछे लटकते पीतल के डिब्बे आपस में टकराकर ध्वनि करते—जैसे सुबह का अनौपचारिक संगीत। खेतों की ओर जाते पुरुष कंधे पर हल या फावड़ा रखे धीमे-धीमे बातचीत करते चलते—
“आज नहर में पानी आएगा क्या?”
“खाद का दाम फिर बढ़ गया है . . .”
इन्हीं यथार्थ ध्वनियों के बीच अभिराम अपने छोटे-से कमरे से निकलता। दीवार पर टँगी घड़ी अक्सर बंद पड़ी होती; समय का अनुमान वह आकाश की रोशनी से लगाता। उसका झोला कई जगह से घिस चुका था, किनारों पर धागे निकल आए थे। उसमें उपस्थिति रजिस्टर, दो-तीन पुरानी पाठ्यपुस्तकें, बच्चों के लिए चॉक का डिब्बा और अपनी एक डायरी रहती—जिसमें वह कभी-कभी कविता की पंक्तियाँ लिख लेता।
दरवाज़े पर खड़ी माँ कहती—
“जल्दी लौट आना, आज गेहूँ पिसवाने जाना है।”
वह सिर हिलाकर पगडंडी की ओर बढ़ जाता। रास्ते में उसे कई चेहरे मिलते—
राम-राम मास्टर साहब!”
“आज स्कूल खुला रहेगा न?”
वह मुस्कुराकर उत्तर देता—
“हाँ भइया, खुला रहेगा। बच्चे भेज देना।”
पगडंडी पर चलते हुए उसके पैरों में धूल लगती, पर उसके क़दमों में एक स्थिरता थी। यह वही गाँव था जहाँ अभाव स्थायी था, पर जीवन रुकता नहीं था। और इसी जीवन की वास्तविक, खुरदुरी सुबह के बीच अभिराम प्रतिदिन विद्यालय की ओर निकलता—किसी स्वप्नलोक में नहीं, बल्कि ठोस धरती पर टिके हुए।
घर से निकलने के ठीक पहले का वह समय अभिराम के लिए सबसे कठिन होता था। बाहर सुबह की चहल-पहल शुरू हो चुकी होती, पर भीतर घर की चिंताएँ अब भी रात की तरह घनी पड़ी रहतीं। पिता खाट पर आधे उठे-आधे लेटे खाँस रहे थे। खाँसी अब साधारण नहीं रह गई थी—लंबी, गहरी और थका देने वाली। सिरहाने रखी पुरानी शीशी में बची दवा लगभग समाप्त हो चुकी थी।
माँ आँगन से भीतर आईं। उनके हाथ आटे से सने थे, पर आँखों में हिसाब-किताब की रेखाएँ साफ़ थीं।
“बेटा, ” उन्होंने धीमे पर सीधे स्वर में पूछा, “इस महीने की दवा के पैसे कहाँ से आएँगे? तेरे पिता की खाँसी बढ़ती जा रही है। रात भर सो नहीं पाए।”
अभिराम कुछ क्षण चुप रहा। उसने झोला उठाया, फिर रखा। जैसे शब्दों को भी सँभाल रहा हो।
“देखिए अम्मा, ” उसने संयत आवाज़ में कहा, “इस बार वेतन आए तो पहले दवा ही लाएँगे। राशन थोड़ा उधार चल जाएगा। रामस्वरूप की दुकान पर बात कर लूँगा।”
माँ ने सिर झुका लिया।
“उधार . . . कब तक? पिछली बार का भी पूरा नहीं चुकाया है। और सुन, खाद का पैसा भी देना है। तेरे चाचा सुबह कह रहे थे।”
भीतर से फिर खाँसी की तेज़ आवाज़ आई। माँ की आँखें भर आईं।
“तेरी पढ़ाई में कितना ख़र्च किया, ” उन्होंने जैसे अपने आप से कहा, “कोचिंग, किताबें . . . सोचा था बड़ा अफ़सर बनेगा। हमारा भी बुढ़ापा सँवर जाएगा। यह मास्टरी . . . इसमें न तनखा ढंग की, न ठिकाना।”
अभिराम ने माँ की ओर देखा। उसमें न खीझ थी, न आक्रोश—बस एक शांत स्वीकार।
“अम्मा, ” वह पास आकर बोला, “अफ़सर बन जाता तो शायद महीने के अंत में पैसे ज़्यादा होते, पर क्या ज़रूरी है कि आदमी की क़ीमत उसकी कुर्सी से ही तय हो? मैं जो कर रहा हूँ, उसमें कमाई भले कम हो, पर काम सच्चा है।”
माँ ने हल्की झुँझलाहट में कहा—
“सच्चाई से पेट भरता है क्या?”
वह मुस्कुराया, पर मुस्कान में हल्की थकान थी।
“नहीं अम्मा, पेट तो रोटी से ही भरता है। इसलिए कोशिश कर रहा हूँ कि रोटी भी आए और इज़्ज़त भी बनी रहे। अफ़सर न सही . . . किसी के काम तो आ रहा हूँ।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस उसके झोले की फटी सिलाई को उँगलियों से टटोला और बोलीं—
“वापस आते समय सुई-धागा लेते आना। यह भी फट गया है।”
अभिराम ने सिर हिलाया। बाहर निकलते समय उसने एक बार पिता की ओर देखा। खाट के पास रखी दवा की ख़ाली शीशी जैसे उसे याद दिला रही थी—जीवन भावनाओं से नहीं, व्यवस्था से चलता है।
पर वह यह भी जानता था—यदि मन टूट गया, तो व्यवस्था सँभालने की शक्ति भी नहीं बचेगी।
और इसी द्वंद्व को भीतर लिए वह दरवाज़े से बाहर चला गया—कर्तव्य और करुणा के बीच संतुलन साधते हुए।
विद्यालय की इमारत सचमुच दो युगों के बीच अटकी हुई लगती थी—सामने का हिस्सा पक्की ईंटों का, जिसे किसी सरकारी योजना के अंतर्गत बनवाया गया था; पीछे की दो कक्षाएँ अब भी कच्ची दीवारों और टीन की चादरों पर टिकी थीं। बरसात में टीन पर गिरती बूँदें इतना शोर करतीं कि पढ़ाना कठिन हो जाता, और कई जगहों से पानी टपकने लगता। गर्मियों में वही टीन भट्ठी की तरह तपती। बच्चे अक्सर अपने गमछे बिछाकर ज़मीन पर बैठते, क्योंकि बेंचें पर्याप्त नहीं थीं।
उस दिन मध्याह्न अवकाश के बाद प्रधानाध्यापक अपने कमरे में रजिस्टर देख रहे थे। मेज़ पर उपस्थिति-पंजी खुली थी, जिसमें कई नामों के आगे लगातार तीन-चार दिन की अनुपस्थिति दर्ज थी।
उन्होंने चश्मा नाक पर ऊपर खिसकाया और अभिराम को बुलाया—
“अभिराम जी, ज़रा बैठिए।”
अभिराम कुर्सी के किनारे पर बैठ गया।
प्रधानाध्यापक ने रजिस्टर की ओर इशारा किया—
“देखिए, आपकी कक्षा में पढ़ाई ठीक चल रही है। निरीक्षण में भी तारीफ़ हुई थी। पर समस्या यह है कि बच्चे नियमित नहीं आ रहे। इस तरह परिणाम नहीं सुधरेंगे। अभिभावकों से बात करनी पड़ेगी।”
अभिराम ने पन्नों पर नज़र डाली। मुकेश, राधा, सोनू—कई नाम लगातार अनुपस्थित।
“मैं आज शाम को ख़ुद जाकर बात करूँगा, ” उसने शांत स्वर में कहा, “अगर वे मानें तो।”
प्रधानाध्यापक ने हल्की चिंता से कहा—“गाँव की स्थिति आप जानते हैं। लोग पढ़ाई को अभी भी ख़र्च समझते हैं, निवेश नहीं।”
शाम ढलने लगी थी जब अभिराम मुकेश के घर पहुँचा। कच्ची दीवारों वाला छोटा-सा घर, बाहर बँधी दुबली-सी गाय, और आँगन में सूखते गोबर के उपले। मुकेश घर पर नहीं था। पड़ोसन ने बताया—“खेत पर होगा, बाप के साथ।”
अभिराम खेत की ओर बढ़ गया। दूर तक गेहूँ की हरियाली फैली थी। एक कोने में मुकेश अपने पिता के साथ नाली साफ़ कर रहा था। पिता फावड़ा पकड़े हुए थे।
“राम-राम काका,” अभिराम ने आवाज़ दी।
मुकेश के पिता ने फावड़ा रोका, माथे का पसीना पोंछा और पास आए—“राम-राम मास्टर साहब। कहिए, क्या बात है?”
“मुकेश तीन दिन से स्कूल नहीं आया, ” अभिराम ने सीधे विषय पर आते हुए कहा, “ऐसे पढ़ाई छूट जाएगी।”
काका ने हल्की हँसी में बात टालने की कोशिश की—“मास्टर जी, पेट पहले है कि पढ़ाई? खेत में हाथ न बँटाए तो घर कैसे चले? मज़दूर रखने के पैसे नहीं हैं। खाद का दाम बढ़ गया, फ़सल का भाव गिर गया। आप ही बताइए।”
अभिराम ने खेत की मेड़ पर खड़े होकर चारों ओर देखा। मिट्टी में दरारें थीं; सिंचाई पूरी नहीं हुई थी। यह तर्क केवल बहाना नहीं, वास्तविकता की स्पष्ट झलक थी।
वह कुछ क्षण मौन रहा, फिर धीमे पर दृढ़ स्वर में बोला—“काका, मैं आपकी मजबूरी समझता हूँ। पर अगर मुकेश पढ़ लेगा तो शायद यही खेत बचाने का बेहतर तरीक़ा सीख जाएगा—नई क़िस्म का बीज, सरकारी योजना, बाज़ार का सही दाम। अभी की मज़दूरी से बस आज निकलता है, आगे की ज़िंदगी नहीं बनती।”
काका ने मुकेश की ओर देखा—“तू क्या चाहता है? साफ़-साफ़ बता।”
मुकेश ने हाथ की मिट्टी झाड़ी, आँखें नीचे किए बोला—“बाबा, मैं पढ़ना चाहता हूँ। गुरुजी कहते हैं मैं छात्रवृत्ति की परीक्षा दे सकता हूँ।”
काका कुछ देर चुप रहे। फिर भारी स्वर में बोले—“ठीक है। सुबह आधा दिन खेत, आधा दिन स्कूल। पर एक बात साफ़—फ़ीस नहीं दे पाऊँगा। किताब-कॉपी का ख़र्च भी मुश्किल है।”
अभिराम ने बिना झिझक कहा—“फ़ीस की चिंता मत कीजिए। वह मैं देख लूँगा। किताबें स्कूल की पुरानी मिल जाएँगी। आप बस इसे आने दीजिए।”
काका ने पहली बार उसके चेहरे को ग़ौर से देखा—“मास्टर साहब, आप लोग भी अजीब होते हैं। अपना क्या मिलता है इसमें?”
अभिराम ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—“जब यह आगे बढ़ेगा, वही मेरा मिलना होगा।”
मुकेश की आँखों में चमक थी—जैसे किसी ने उसके भीतर एक दीया जला दिया हो।
उस रात घर लौटते समय अभिराम की जेब लगभग ख़ाली थी। रास्ते में उसने सोचा—अगले महीने वेतन का कुछ हिस्सा मुकेश की किताबों में जाएगा। घर की दवाइयाँ, उधार, और ख़र्च—सब फिर टलेंगे।
पर भीतर एक अजीब-सी शान्ति थी। उसे लगा—आज उसने केवल एक विद्यार्थी की उपस्थिति नहीं बढ़ाई, बल्कि एक सम्भावना को गिरने से बचा लिया है।
आकाश में हल्की चाँदनी थी, पर खेतों के किनारे कीचड़ अब भी गीली थी। पगडंडी पर चलते हुए उसके जूतों में मिट्टी चिपक रही थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ थी और घरों की बुझती बत्तियाँ बता रही थीं कि दिन सचमुच समाप्त हो चुका है।
उसे पहली बार साफ़-साफ़ महसूस हुआ—संघर्ष किताबों की पंक्तियाँ नहीं होते, वे रसोई के ख़ाली डिब्बों में, फ़ीस की रसीदों में और पिता की झुकी हुई पीठ में दिखाई देते हैं।
निर्णय भी उतने ही वास्तविक होते हैं—वे किसी भाषण में नहीं, बल्कि इस बात में छिपे होते हैं कि कल वह नौकरी के लिए शहर जाएगा या यहीं रहकर घर की ज़िम्मेदारी सँभालेगा।
और शायद प्रेम का प्रतिदान शब्दों में नहीं, बल्कि इन्हीं छोटे, ठोस निर्णयों में छिपा होता है—जहाँ कोई अपने सपनों को थोड़ा पीछे रख देता है, ताकि किसी और की नींद सुरक्षित रह सके।
नीलिमा की स्मृति अब उसके भीतर किसी तीव्र पीड़ा की तरह नहीं उठती थी; वह शांत लहर की तरह थी—दिखती नहीं, पर उपस्थित रहती। दिन भर की दौड़-भाग के बाद जब विद्यालय से लौटकर वह साँझ को नदी किनारे बैठता, तो अतीत स्वयं उसके पास आकर बैठ जाता।
नदी का जल उस समय धीमा और गहरा दिखता। किनारे पर बैठे मछुआरे जाल समेट रहे होते, दूर कहीं भैंसें पानी में आधी डूबी खड़ी रहतीं। वह कंकड़ उठाकर पानी में फेंकता और उठती लहरों को देखता।
मन ही मन पूछता—“अगर तुम रुक जातीं तो क्या होता? क्या जीवन कुछ और दिशा लेता?”
उत्तर कहीं बाहर से नहीं आता, भीतर से ही उठता—“शायद तब तुम अपने दुःख में उलझे रहते। शायद तुम यह न बन पाते जो आज हो।”
एक दिन दोपहर में जब वह विद्यालय से लौटा, तो डाकिया दरवाज़े पर खड़ा मिला।
“अभिराम बाबू, शहर से चिट्ठी है, ” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “लगता है कोई ख़ास है, रजिस्ट्री है।”
अभिराम ने हस्ताक्षर किए। लिफ़ाफ़े की लिखावट पहचानने में उसे एक क्षण भी नहीं लगा। वह बरामदे की चौकी पर बैठ गया।
पत्र में लिखा था—
“अभिराम,
यहाँ सब ठीक है। स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए अक्सर तुम्हारी कही बातें याद आती हैं। तुम कहते थे—‘शिक्षा केवल रोज़गार नहीं, दृष्टि देती है।” तब समझ नहीं पाती थी। अब जब बच्चों की आँखों में प्रश्न देखती हूँ, तो तुम्हारी बात सच लगती है। जीवन में बहुत कुछ पा लिया, पर कुछ मूल्य देर से समझ में आते हैं . . . ”
पत्र लंबा नहीं था, पर उसमें स्वीकार की एक विनम्रता थी।
वह कुछ देर चुप बैठा रहा। भीतर कोई तूफ़ान नहीं उठा—सिर्फ़ एक हल्की-सी थिरकन, जैसे किसी पुराने घाव पर हवा लगी हो।
उसी समय माँ भीतर से आईं।
“किसकी चिट्ठी है?”
“पुरानी परिचित की,” उसने संक्षेप में कहा और पत्र मोड़कर किताब के भीतर रख दिया।
माँ ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
“बेटा, मन में कुछ दबाकर मत रखा कर। आदमी भीतर से सूख जाता है। तेरे पिता भी बहुत-सी बातें कह नहीं पाए, इसलिए चिड़चिड़े हो गए।”
वह हल्के से मुस्कुराया।
“अम्मा, जो सूखता है, वही कभी-न-कभी बरसता भी है। धरती भी तो सूखती है, तब ही बारिश का मोल समझ आता है।”
माँ कुछ समझीं, कुछ नहीं; पर उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
शीत ऋतु में उसकी बीमारी ने घर की स्थिति और कठिन कर दी। ज्वर के कारण वह कई दिन विद्यालय नहीं जा पाया। दवाइयों के लिए उधार लेना पड़ा। रामस्वरूप की दुकान पर हिसाब की एक और पंक्ति जुड़ गई।
एक दोपहर प्रधानाध्यापक स्वयं घर आए।
“कैसे हैं अब?” उन्होंने पूछा।
“ठीक हूँ, दो-तीन दिन में आ जाऊँगा, ” अभिराम ने उठने की कोशिश की।
प्रधान ने रोक दिया—“नहीं, पहले पूरी तरह ठीक हो जाइए। विद्यालय का काम हम देख लेंगे। पर सच कहूँ, आपकी कमी खल रही है। बच्चे पूछते रहते हैं।”
अभिराम ने पहली बार अनुभव किया कि उसकी उपस्थिति केवल नौकरी का दायित्व नहीं, सम्बन्ध का आधार बन चुकी है।
अगली सुबह आँगन में हलचल हुई। मुकेश, राधा और दो-तीन बच्चे खड़े थे।
“गुरुजी!” मुकेश ने पुकारा, “आप नहीं आए तो स्कूल सूना लगता है।”
राधा ने हाथ में एक छोटी-सी थैली बढ़ाई—“माँ ने गुड़ भेजा है। कहती हैं, इससे ताक़त आएगी।”
एक और बच्ची बोली—“आप कहानी नहीं सुनाएँगे तो पढ़ाई अच्छी नहीं लगती।”
उनकी सहज बातें सुनकर उसकी आँखें नम हो गईं। उसने सोचा—यह स्नेह किसी औपचारिक सम्मान से बड़ा है।
उसी क्षण उसे पहली बार स्पष्ट अनुभव हुआ—प्रेम केवल स्मृति नहीं, उत्तरदायित्व भी है। वह किसी एक व्यक्ति की अनुपस्थिति से समाप्त नहीं होता; वह नए रूप में जीवन माँगता है।
फाल्गुन आया तो वातावरण बदल गया। विद्यालय में बसंत पंचमी का छोटा-सा आयोजन रखा गया। बच्चों ने अपने-अपने घरों से पीले गमछे, चुनरी या रिबन ढूँढ़ निकाले। कक्षा के सामने ईंटों को जोड़कर एक छोटा मंच बनाया गया।
अभिराम ने बच्चों से कहा—“यह उत्सव केवल ऋतु का नहीं, सीखने का है। ज्ञान भी बसंत की तरह ही जीवन में रंग भरता है।”
कार्यक्रम में मुकेश ने कविता सुनाई—
“सूखी डाली पर फिर से,
फूलों ने दस्तक दी है,
बीते हुए मौसम की
चुप्पी भी अब पिघली है . . . ”
कविता सुनते समय अभिराम को लगा जैसे ये पंक्तियाँ केवल ऋतु की नहीं, उसके अपने जीवन की कथा कह रही हों।
कार्यक्रम के अंत में प्रधानाध्यापक ने घोषणा की—“इस वर्ष पाँच बच्चे छात्रवृत्ति परीक्षा में पास हुए हैं। यह विद्यालय के लिए बड़ी बात है। इसका श्रेय अभिराम को जाता है।”
बच्चों ने तालियाँ बजाईं। अभिराम ने सिर झुका लिया। यह सम्मान व्यक्तिगत नहीं लगा; जैसे पूरे गाँव के संघर्ष की छोटी-सी स्वीकृति हो।
उसी शाम वह फिर नदी किनारे गया। हवा में आम्र-मंजरियों की गंध थी। खेतों में सरसों अब भी पीली थी, पर हवा में गर्माहट घुलने लगी थी।
वह धीरे से बोला—“प्रेम, तुम किसी एक हृदय में नहीं ठहरे। तुम इन सबके जीवन में फैल गए।”
उसे लगा—प्रकृति का विधान अत्यंत ठोस और व्यावहारिक है। वह भावनाओं को सहेजकर रखती है, उन्हें मिट्टी में दबाती है, और समय आने पर फल में बदल देती है।
जिस प्रेम को उसने कभी नीलिमा के लिए सँजोया था, वह अब बच्चों के भविष्य में, अभिभावकों के विश्वास में, और अपने आत्मसम्मान में प्रतिफलित हो रहा था।
अगले दिन कक्षा में उसने बच्चों से कहा—
“याद रखो—
जो प्रेम केवल पाने के लिए हो, वह जल्दी टूट जाता है।
जो प्रेम देने के लिए हो, वह समाज बनाता है।”
बाहर पलाश दहक रहे थे। भीतर बच्चों की आँखों में नई रोशनी थी।
अभिराम ने शांत मन से स्वीकार किया—
प्रतिदान हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होता।
कभी वह प्रतीक्षा के रूप में आता है,
कभी त्याग के रूप में,
और कभी भीतर की निश्चिंतता बनकर।
उसे लगा—उसे उसका प्रतिदान मिल चुका है।
क्योंकि अब उसके भीतर कोई प्रश्न शेष नहीं था,
कोई अपेक्षा शेष नहीं थी।
बसंत अब केवल ऋतु नहीं था—
वह समय का एक तर्क था,
जो सिद्ध करता है कि जीवन शून्य नहीं रचता।
हर सच्चा भाव किसी न किसी रूप में
अस्तित्व में परिवर्तित होता ही है।
वह समझ गया—
प्रेम का उत्तर शब्दों में नहीं,
परिवर्तन में मिलता है।
और जो प्रेम निष्काम हो,
वह कभी व्यर्थ नहीं जाता—
वह बसंत बनकर लौटता है,
भले ही किसी और आकाश के नीचे।
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