अँधेरे में छिपा दीप
अमरेश सिंह भदौरिया
जिसके जीवन में
अंधकार उतरता है
शायद उसी के भीतर
दीप जलने की शुरूआत भी होती है
यह मैं निश्चित होकर नहीं कहता
पर इतना अनुभव है
कि जीवन
यूँ ही कुछ नहीं देता
अंधकार
सिर्फ़ रात भर का अँधेरा नहीं होता
वह चुपचाप उतरता है
मन की थकान में
कुछ अधूरी रह गई इच्छाओं में
और उन क्षणों में
जब बहुत कुछ करने के बाद भी
हाथ ख़ाली रह जाते हैं
कभी यह अंधकार
बिना बताए
आत्मविश्वास के आकाश पर छा जाता है
और तब लगता है
जैसे भीतर का उजाला
कहीं चला गया हो
कभी
रिश्तों के बीच
एक अजीब-सी ख़ामोशी बन जाता है
जहाँ बात तो होती है
पर बात होती नहीं
और कभी-कभी
भीड़ में खड़ा आदमी
अचानक अपने ही भीतर
अजनबी हो जाता है
यह अनुभव थोड़ा कठिन है
पर सच है
लेकिन
यही अंधकार
हर बार केवल तोड़ता ही नहीं
धीरे-धीरे
वह कुछ सिखाता भी है
क्योंकि शायद
हर अँधेरे के भीतर
बहुत गहराई में
एक बहुत छोटा-सा दीप छिपा होता है
दीप
कोई बड़ी चीज़ नहीं
वह बस एक ज़िद है
न बुझने की
जब जीवन
तुम्हें अंधकार देता है
तो शायद वह यह देखता है
कि तुम उसमें खो जाओगे
या कुछ खोजोगे
यह चुनाव आसान नहीं होता
व्यक्तिगत जीवन में
जब अपने ही लोग
अनजाने में दूर हो जाते हैं
तब भीतर कहीं
एक हल्की-सी रोशनी
सँभलने लगती है
जब समाज
तुम्हें समझने की जगह
परखने लगता है
तब वही दीप
तुम्हें अपने पक्ष में खड़ा होना सिखाता है
और जब सब कुछ
थोड़ा-थोड़ा शांत हो जाता है
तब वही दीप
तुम्हें
तुमसे मिलाता है
अंधकार
शायद अंत नहीं है
वह एक ख़ाली जगह है
जहाँ कुछ नया जन्म ले सकता है
इसलिए
अगर जीवन में अंधकार आया है
तो घबराना स्वाभाविक है
पर रुक जाना ज़रूरी नहीं
क्योंकि उसी अँधेरे में
कहीं न कहीं
एक छोटा-सा दीप
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होता है
तुम्हारे धैर्य में
तुम्हारी स्वीकृति में
और कभी-कभी
तुम्हारे मौन में भी
और जब वह दीप
तुम्हें मिल जाता है
तब समझ आता है
कि अंधकार
शत्रु नहीं था
वह तो
धीरे-धीरे
तुम्हें तुम्हारे ही प्रकाश तक
ले जाने का
एक रास्ता था।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अँधेरे में छिपा दीप
- अधनंगे चरवाहे
- अधूरा सच
- अनंत पथ
- अनाविर्भूत
- अनुभूति की प्रथम ध्वनि
- अफ़वाह
- अभिशप्त अहिल्या
- अमरबेल
- अमलतास
- अवसरवादी
- अहिल्या का प्रतिवाद
- अख़बार वाला
- आँखें मेरी आज सजल हैं
- आँगन
- आँगन की तुलसी
- आज की यशोधरा
- आज वाल्मीकि की याद आई
- आरक्षण की बैसाखी
- आस्तीन के साँप
- आख़िर क्यों
- इक्कीसवीं सदी
- उपग्रह
- उपग्रह
- ऋतुराज की अनुगामिनी: फरवरी
- एकाकी परिवार
- ओस की बूँदें
- कचनार
- कछुआ धर्म
- कमरबंद
- कुरुक्षेत्र
- कैक्टस
- कोहरा
- क्यों
- क्षरित होते जीवन मूल्य
- खलिहान
- गाँव - पहले वाली बात
- गिरगिट
- चाँदनी रात
- चित्र बोलते हैं
- चुप रहो
- चुभते हुए प्रश्न
- चूड़ियाँ
- चेतना का उत्तरायण
- चैत दुपहरी
- चौथापन
- चौराहा
- जब नियति परीक्षा लेती है
- ज्वालामुखी
- ढलती शाम
- तितलियाँ
- तुम्हारा प्रेम
- दंड दो मुझे
- दहलीज़
- दिया (अमरेश सिंह भदौरिया)
- दीपक
- दृष्टिकोण जीवन का अंतिम पाठ
- देह का भूगोल
- देहरी
- दो जून की रोटी
- धरती की पीठ पर
- धुँधलका
- धोबी घाट
- नदी सदा बहती रही
- नयी पीढ़ी
- नागफनी
- नेपथ्य में
- पगडंडी पर कबीर
- पतंग
- परिधि और त्रिभुज
- परिभाषाओं से परे
- पहली क्रांति
- पहाड़ बुलाते हैं
- पाखंड
- पारदर्शी सच
- पीड़ा को नित सन्दर्भ नए मिलते हैं
- पुत्र प्रेम
- पुष्प वाटिका
- पुस्तकें
- पूर्वजों की थाती
- प्रभाती
- प्रारब्ध को चुनौती
- प्रेम की चुप्पी
- फुहार
- बंजर ज़मीन
- बंजारा
- बबूल
- बवंडर
- बिखरे मोती
- बुनियाद
- भगीरथ संकल्प
- भाग्य रेखा
- भावनाओं का बंजरपन
- भुइयाँ भवानी
- मन मरुस्थल
- मनीप्लांट
- महावर
- माँ
- मुक्तिपथ
- मुखौटे
- मैं भला नहीं
- योग्यता का वनवास
- रहट
- रातरानी
- लेबर चौराहा
- शक्ति का जागरण
- शस्य-श्यामला भारत-भूमि
- शान्तिदूत
- शीतल छाँव
- सँकरी गली
- संयम और साहस का पर्व
- सकठू की दीवाली
- सती अनसूया
- सत्य की छेनी
- सरस्वती वंदना
- सरिता
- सस्ती लोकप्रियता
- सावन में सूनी साँझ
- सैटेलाइट का मोतियाबिंद
- हरसिंगार
- हल चलाता बुद्ध
- ज़ख़्म जब राग बनते हैं
- सामाजिक आलेख
-
- अंबेडकर के विचारों का समकालीन संदर्भ
- आज़ादी के आठ दशक
- इतिहास के दो दर्पण
- गणतंत्र की गरिमा और वैश्विक झंझावात
- नववर्ष की पूर्व संध्या पर
- बरगद और पीपल
- बाल दिवस—स्क्रीन और सपनों के बीच एक मौन संघर्ष
- भारतीय वायुसेना दिवस— शौर्य की उड़ान, आकाश का अभिमान
- मज़दूर दिवस: श्रम, संघर्ष और सामाजिक न्याय का उत्सव
- संपन्नता के बदलते मायने
- कहानी
- कविता-मुक्तक
-
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 001
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 002
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 003
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 004
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 005
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 006
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 007
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - 008
- अमरेश सिंह भदौरिया - मुक्तक - होली
- साहित्यिक आलेख
- सांस्कृतिक आलेख
-
- कृतज्ञता का पर्व पितृपक्ष
- कृष्ण का लोकरंजक रूप
- चैत्र नवरात्रि: आत्मशक्ति की साधना और अस्तित्व का नवजागरण
- जगन्नाथ रथ यात्रा: आस्था, एकता और अध्यात्म का महापर्व
- न्याय और अन्याय के बीच
- परंपरा के पार—जहाँ गुण जाति से ऊपर उठे
- बलराम जयंती परंपरा के हल और आस्था के बीज
- बुद्ध पूर्णिमा: शून्य और करुणा का संगम
- योगेश्वर श्रीकृष्ण अवतरणाष्टमी
- रामनवमी: मर्यादा, धर्म और आत्मबोध का पर्व
- लोक आस्था का पर्व: वट सावित्री पूजन
- विजयदशमी—राम और रावण का द्वंद्व, भारतीय संस्कृति का संवाद
- विश्व योग दिवस: शरीर, मन और आत्मा का उत्सव
- शब्दों से परे एक दिन
- श्राद्ध . . . कृतज्ञता और आशीर्वाद का सेतु
- समय के आईने में सनातन
- चिन्तन
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- ऐतिहासिक
- लघुकथा
- किशोर साहित्य कविता
- सांस्कृतिक कथा
- ललित निबन्ध
- शोध निबन्ध
- ललित कला
- पुस्तक समीक्षा
- हास्य-व्यंग्य कविता
- गीत-नवगीत
- विडियो
-
- ऑडियो
-