अँधेरे में छिपा दीप

01-05-2026

अँधेरे में छिपा दीप

अमरेश सिंह भदौरिया (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जिसके जीवन में
अंधकार उतरता है
शायद उसी के भीतर
दीप जलने की शुरूआत भी होती है
 
यह मैं निश्चित होकर नहीं कहता
पर इतना अनुभव है
कि जीवन
यूँ ही कुछ नहीं देता
 
अंधकार
सिर्फ़ रात भर का अँधेरा नहीं होता
वह चुपचाप उतरता है
मन की थकान में
कुछ अधूरी रह गई इच्छाओं में
और उन क्षणों में
जब बहुत कुछ करने के बाद भी
हाथ ख़ाली रह जाते हैं
 
कभी यह अंधकार
बिना बताए
आत्मविश्वास के आकाश पर छा जाता है
और तब लगता है
जैसे भीतर का उजाला
कहीं चला गया हो
 
कभी
रिश्तों के बीच
एक अजीब-सी ख़ामोशी बन जाता है
जहाँ बात तो होती है
पर बात होती नहीं
 
और कभी-कभी
भीड़ में खड़ा आदमी
अचानक अपने ही भीतर
अजनबी हो जाता है
यह अनुभव थोड़ा कठिन है
पर सच है
 
लेकिन
यही अंधकार
हर बार केवल तोड़ता ही नहीं
 
धीरे-धीरे
वह कुछ सिखाता भी है
 
क्योंकि शायद
हर अँधेरे के भीतर
बहुत गहराई में
एक बहुत छोटा-सा दीप छिपा होता है
 
दीप
कोई बड़ी चीज़ नहीं
वह बस एक ज़िद है
न बुझने की
 
जब जीवन
तुम्हें अंधकार देता है
तो शायद वह यह देखता है
कि तुम उसमें खो जाओगे
या कुछ खोजोगे
 
यह चुनाव आसान नहीं होता
 
व्यक्तिगत जीवन में
जब अपने ही लोग
अनजाने में दूर हो जाते हैं
तब भीतर कहीं
एक हल्की-सी रोशनी
सँभलने लगती है
 
जब समाज
तुम्हें समझने की जगह
परखने लगता है
तब वही दीप
तुम्हें अपने पक्ष में खड़ा होना सिखाता है
 
और जब सब कुछ
थोड़ा-थोड़ा शांत हो जाता है
तब वही दीप
तुम्हें
तुमसे मिलाता है
 
अंधकार
शायद अंत नहीं है
वह एक ख़ाली जगह है
जहाँ कुछ नया जन्म ले सकता है
 
इसलिए
अगर जीवन में अंधकार आया है
तो घबराना स्वाभाविक है
पर रुक जाना ज़रूरी नहीं
 
क्योंकि उसी अँधेरे में
कहीं न कहीं
एक छोटा-सा दीप
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होता है
 
तुम्हारे धैर्य में
तुम्हारी स्वीकृति में
और कभी-कभी
तुम्हारे मौन में भी
 
और जब वह दीप
तुम्हें मिल जाता है
 
तब समझ आता है
 
कि अंधकार
शत्रु नहीं था
 
वह तो
धीरे-धीरे
तुम्हें तुम्हारे ही प्रकाश तक
ले जाने का
एक रास्ता था। 

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