शिखर की भारतीय परिभाषा
अमरेश सिंह भदौरिया
अक्सर जब मैं हिमालय की तुंग और मौन चोटियों को निहारता हूँ, तब मन के भीतर एक सूक्ष्म किन्तु तीव्र द्वंद्व जन्म ले लेता है। क्या शिखर वास्तव में वही अंतिम बिंदु है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य शेष संसार से कट जाता है? क्या ऊँचाई का अर्थ अनिवार्यतः एकांत और अलगाव है? आधुनिक पाश्चात्य चिंतन लंबे समय से इसी धारणा को पुष्ट करता आया है कि शिखर पर केवल एक के लिए स्थान होता है, और वहाँ पहुँचने की यात्रा अनिवार्य रूप से प्रतिस्पर्धा, संघर्ष और पराजय की कथा बन जाती है।
इस दृष्टि में जीवन एक ऐसी दौड़ बन जाता है, जहाँ लक्ष्य नहीं, बल्कि दूसरों को पीछे छोड़ देना ही सफलता का पर्याय है। शिखर वहाँ विजय का प्रतीक है—पर वह विजय ‘स्व’ की नहीं, ‘अहं’ की होती है। यह चिंतन मनुष्य को मनुष्य से अलग करता है और ऊँचाई को संकुचन में बदल देता है।
किन्तु जब मैं भारतीय दर्शन की गहन और विस्तृत भूमि में प्रवेश करता हूँ, तब यह धारणा किसी रेत के महल की भाँति ढह जाती है। भारतीय संस्कृति में शिखर का अर्थ ‘अलगाव’ नहीं, बल्कि ‘विलय’ है। यहाँ ऊँचाई का तात्पर्य दूसरों से ऊपर होना नहीं, बल्कि सबके साथ एक हो जाना है।
पाश्चात्य चिंतन जीवन को एक शंक्वाकार संरचना के रूप में देखता है—जैसे-जैसे व्यक्ति ऊपर बढ़ता है, स्थान सिमटता जाता है, और अंततः केवल एक ही शेष रह जाता है। इसके विपरीत भारतीय दृष्टि जीवन को सागर के रूप में समझती है। पर्वत की ढलानों से उतरती असंख्य नदियाँ जब तक अलग-अलग बहती हैं, तब तक उनका अपना नाम, अपना वेग और अपनी सीमाएँ होती हैं। उनमें टकराव हो सकता है, दिशा को लेकर संघर्ष हो सकता है। परन्तु जैसे ही वे अपने गंतव्य को प्राप्त करती हैं, उनका समस्त द्वैत लय हो जाता है। सागर में पहुँचकर न कोई गंगा रहती है, न यमुना—केवल जल रहता है, विराट और समावेशी।
भारतीय दर्शन के अनुसार शिखर वह स्थिति नहीं है, जहाँ आप दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ ‘दूसरा’ कोई बचता ही नहीं। जब आदि शंकराचार्य या महर्षि रमण जैसी विभूतियाँ ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त करती हैं, तो वे अकेले नहीं होतीं। उनका ‘स्व’ इतना विस्तृत हो जाता है कि उसमें समस्त चराचर जगत समाहित हो जाता है। वहाँ प्रतिस्पर्धा नहीं, केवल करुणा शेष रहती है; वहाँ अहं नहीं, केवल अनुभूति बोलती है।
यदि शिखर पर पहुँचकर भी आपको कोई ऐसा दिखाई दे, जिससे आपको तुलना करनी पड़े, जिससे आगे निकलने की आकांक्षा शेष हो—तो निश्चय ही वह शिखर नहीं, केवल एक ऊँचा टीला है। सच्चा शिखर तो वही है, जहाँ पहुँचकर तुलना का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।
भारतीय संस्कृति मूलतः समावेश की संस्कृति है। हमारा शिखर वह बिंदु है, जो बिंदु बने रहने का नहीं, सिंधु हो जाने का साहस रखता है। जहाँ संघर्ष के स्थान पर सह-अस्तित्व की बात की जाती है, और सफलता को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक कल्याण से जोड़ा जाता है। यहाँ मुक्ति का अर्थ अकेले किसी स्वर्ग का उपभोग नहीं, बल्कि अपनी चेतना को उस सार्वभौमिक सत्य में विलीन कर देना है, जहाँ संपूर्ण सृष्टि एक परिवार बन जाती है।
आज जब समूचा विश्व संकीर्णताओं, स्वार्थ और वैचारिक विभाजन की अग्नि में झुलस रहा है, तब भारत की यह विराट दृष्टि ही शीतलता प्रदान कर सकती है। हमें यह समझना होगा कि शिखर कभी संकुचित नहीं होता—संकुचित हमारी दृष्टि होती है। जिस दिन हमारी चेतना इस विराट को पहचान लेगी, उस दिन शिखर पर खड़ा व्यक्ति अकेला नहीं होगा, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ एकाकार दिखाई देगा।
इसी भाव को उपनिषद् की यह अमर वाणी अभिव्यक्त करती है—
“पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते।”
अर्थात् वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है; और उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
यही भारतीय चेतना का शिखर है—जहाँ पहुँचकर मनुष्य ऊँचा नहीं होता, बल्कि व्यापक हो जाता है।
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