परिभाषाओं से परे

01-01-2026

परिभाषाओं से परे

अमरेश सिंह भदौरिया (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वह जो अनंत है, 
उसे नकार देना अपराध नहीं—
शायद यह सत्य की खोज का एक पड़ाव हो, 
या किसी मन का कोरा और साफ़ इनकार। 
 
अपराध तो वह है—
जब तुम उसे ईंटों की दीवारों में चुन देते हो, 
जब तुम उसकी असीम करुणा को
अपनी छोटी-सी ‘मान्यता’ के लिफ़ाफ़े में बंद कर देते हो। 
 
तुमने उसे रंगों में बाँटा, 
तुमने उसे शब्दों की सीमाओं में जकड़ा, 
तुमने उसे ‘अपना’ कहा
और बाक़ियों से छीन लिया। 
पर सोचो—
 
क्या आकाश को कभी मुट्ठी में भरा जा सकता है? 
क्या सागर को एक प्याले में उतारा जा सकता है? 
 
वह जो कण-कण का स्पंदन है, 
वह तुम्हारी परिभाषाओं का मोहताज नहीं। 
 
उसे पूजना है तो—
उसे अपनी सोच के पिंजरे से आज़ाद करो। 
सच्ची श्रद्धा वही है, 
जहाँ ईश्वर तुम्हारी धारणाओं से बड़ा हो जाए, 
जहाँ धर्म
नफ़रत की दीवार नहीं, 
प्रेम का खुला आसमान बन जाए। 
 
उसे मुक्त छोड़ दो—
क्योंकि जो हर हृदय में धड़कता है, 
वह किसी एक विचारधारा की
बेड़ियों में नहीं बँध सकता। 

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