दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    1212    22
 
मिल गया उसको रास्ता होता 
शहर मेरे से आशना होता
 
मुझसे मिलना न होता मुश्किल यूँ 
ले पता घर से गर चला होता 
 
रंजो-ग़म दिल में घर बना बैठे
रोने से कुछ न फ़ायदा होता 
 
धूल आईने पे थी जमी शायद 
वरना चहरा चमक रहा होता 
 
अपने क़द पे न होता क़ायम वो 
गर ज़बां से मुकर गया होता 
 
बात इज़्ज़त की होती पट जाती
गर न ग़ैरत का मामला होता 
 
वो परखता ज़मीर ‘देवी’ फिर 
सामने सच का आईना होता

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