क्षमाम्! क्षमाम्! चमचाश्री!

15-02-2021

क्षमाम्! क्षमाम्! चमचाश्री!

डॉ. अशोक गौतम

वैसे तो मैं ऑफ़िस में ऑफ़िस के काम का ध्यान रखूँ या न, पर अपने चमचों का क़दम-क़दम पर पूरा ख़्याल रखता हूँ। क्योंकि मैं कुछ और जानूँ या न, पर यह भली-भाँति  जानता हूँ कि चमचे हैं तो साहब हैं।

फिर भी कुछ दिनों से पहले की तरह फ़ाइलों को न देखने के बदले नोट कर रहा था कि मुझसे मेरा ख़ास चमचा उखड़ा-उखड़ा सा है। भक्तों और चमचों की यही सबसे बड़ी कमज़ोरी होती है कि वे अपने आराध्य से छोटी-छोटी बातों को लेकर अक़्सर उखड़ जाते हैं। ऑफ़िस में सबसे संवेदनशील होता है तो बस, चमचा होता है। चमचे में साहब से अधिक इगो भरी होती है। जब-जब मैं उसके सामने पड़ता, वह मूँछ कटा पहले वाली पूँछ मेरे आगे न हिलाता। पहले की तरह वह मेरे आगे-आगे मेरी बेवज़ह तारीफ़ों के गीत न गाता। बल्कि जब भी मैं उसे अपने पास आकर अपनी प्रशंसा सुनाने को कहता, वह आने में देर करता। यह वही चमचा था जो पहले मेरे कमरे से लाख उठाने के बावूजद भी वहीं डटा रहता था पानीपत की लड़ाई के योद्धा की तरह। मामला समझने की बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं तब समझ नहीं पा रहा था कि चमचा मुझसे इस तरह आख़िर विमुख है तो क्यों है? वैसे मेरे प्रिय चमचे कई बार तो ऑफ़िस के काग़ज़ों पर मेरे बदले मेरे साइन भी ख़ुद ही करते रहे हैं। इससे ज़्यादा और चमचों को चाहिए भी क्या? उँगली के बाद हाथ, लात, विचारात सब तो उनके पास गिरवी रख दिए हैं, पर चमचे का मुँह तब भी देखो तो सूजा हुआ। 

साहब से एक चमचा भी रूठ जाए तो समझो उससे पूरी कायनात रूठ गई। ....आख़िर जब मुझसे चमचे के बिना रहा न गया तो चमचे को अपने कमरे में बुलाने के बदले मैं ख़ुद ही उसके कमरे में चला गया, ठीक वैसे भी जैसे भगवान से जब भक्त नाराज़ हो जाते हैं तो भगवान अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए भक्त के कमरे में ख़ुद ही चले जाया करते हैं। साहब जब चमचों के अधीन हो जाता है तो मत पूछो, चमचों की चमचागिरी के बिना क्या दशा होती है। 

मैं चमचे के कमरे में गया तो चमचा मुँह फुलाए हुए। उसका वह रौद्र रूप देखा तो मैं कोट से लेकर पैंट तक काँप उठा। तब मैंने चमचे के आगे दोनों हाथ जोड़े कहा, "हे चमचाश्री! क्षमाम्! क्षमाम्! मुझसे अनजाने में ऐसा क्या अनर्थ हो गया जो तुमने मेरी चमचागिरी बैन कर दी। मैं सोए बिना रह सकता हूँ। मैं खाए बिना रह सकता हूँ। मैं पिए बिना रह सकता हूँ, पर तुम्हारी चमचागिरी के बिना क़तई नहीं रह सकता। मेरे प्राण मेरे शरीर में नहीं, तुम्हारी चमचागिरी में बसते हैं हे मेरे चमचाश्री!”

तब एकाएक चमचे ने अपनी आँखें तरेरते पता नहीं किस ग़लतफ़हमी के कारण मुझे उसकी ओर से कोई ग़लतफ़हमी न होने के बाद भी मेरी ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए मुझे अपना विराट् रूप दिखाया। वैसा ही, जैसा कुरूक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को बताया था, इस वक़्त जो कृष्ण भी चमचे के इस विराट् रूप को देखते तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा लेते। तब चमचे ने मेरे आगे अपना विराट् रूप दिखाते सीना तानकर कहा, "हे सर! मत भूलो! नास्तिक होने के बाद भी स्वर्ग मिल जाए तो मिल जाए, पर चमचों की अवहेलना करने पर हर हाल में ज़िंदा रहते हर साहब का नरक तय होता है। 

"हे सर! जिस तरह भगवान को भगवान उसके भक्त बनाते हैं उसी तरह साहब को साहब उसके चमचे बनाते हैं। चमचों के बिना साहब की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जो साहब ख़ुद ऑफ़िस की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी संकोच करता है, उसे चने के झाड़ पर सफलतापूर्वक हम चमचे ही चढ़ाते हैं। जिस भगवान के पास भक्त नहीं होते, वह भगवान होने के बाद भी भगवान नहीं कहलाते, ठीक उसी तरह, जिस साहब के पास चमचे नहीं होते वह लाख साहब होने के बाद भी साहबों की किसी भी श्रेणी में नहीं आता। साहब होने के बाद भी वह तिनके के समान ही होता है। जो मंदबुद्धि साहब साहबी के अहंकार में आकर चमचे की अवहेलना करते हैं, वे साहब की डनलप की कुर्सी पर बैठे हुए भी काँटों की कुर्सी पर ही बैठे होते हैं। उन्हें उनके मातहत तो छोड़िए, उनके ऑफ़िस के बाहर लेटा कुत्ता भी नहीं पूछता। किसी भी साहब की पूछ उसके पद से नहीं, उसके चमचों की पलटन द्वारा ही तय होती है। चमचा हर साहब की साख गिराने, उठाने में महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में जो साहब अपने चमचों को अपने से अधिक महत्व नहीं देता, वह नौकरी भर बहुत परेशान रहता है।

"हे सर! चमचों की अहमियत को जानते हुए भी बीच-बीच में क्यों भूल जाते हो कि चमचा ही ऑफ़िस का हर कर्म होता है। चमचा ही साहब का धर्म होता है। चमचा ही साहब का हर मर्ज़ होता है। अपरोक्ष में चमचा ही साहब का सबसे बड़ा सिर का दर्द होता है। चमचा ही हर साहब का सबसे बड़ा ऑफ़िसीय कर्ज़ होता है। चमचा ही सही अर्थों में साहब को साहब बनाने वाला साहब मेकर होता है। चमचा ही साहब का अंतिम लक्ष्य होता है। चमचा ही साहब की इगो का भरण पोषण करने वाला  होता है। चमचा ही साहब को अमरता प्रदान करने वाला होता है, तो साहब की  चार्जशीट का कारण भी चमचा ही होता है। सर! स्मरण रहे, साहबों को उठाने वाले भी चमचे ही होते हैं, और डुबाने वाले भी चमचे ही होते हैं।

"सर! जब किसी साहब के बुरे दिन आते हैं तो वह अपने चमचों से पंगा ले लेता है। और जब कोई साहब अपने चमचों पर अपने से भी अधिक विश्वास करता है तो वह सारा दिन कुर्सी पर लात पर लात धरे हुए भी स्वर्ग सा आंनद प्राप्त करता है। इसलिए हे सर! आपकी भलाई इसी में है कि चौबीसों घंटे आप मुझे अपने में बनाए रखें, मैं आपकी पूजा करता रहूँ, आप मेरा पेट भरते रहें। मैं आपको सलाम करता रहूँ, आप सलाम के दाम अदा करते रहें। क्योंकि बिन कुछ किए आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचाने वाला मात्र मैं ही हूँ।  

"सर! मेरे बिना आपकी कल्पना बेकार है। आप अनित्य हैं तो मैं नित्य हूँ। चमचा, चमचा होने के बाद भी हर साहब का स्वामी है। चमचा ही गधे तक को बताता है कि वह गधा होने के बाद भी गधा नहीं, साहब है। फ़ॉर यूअर काइंड इन्फ़ारमेशन सर! हर क़िस्म के साहब का उत्पत्ति स्थान मैं ही हूँ सर! हर प्रकार के साहब रूपी शब्द का संबोधन जन्म चमचे की कोख से ही होता है सर! जो साहब चमचे के महत्व को जानते हैं सर! वे ऑफ़िस में कुछ न करने के बाद भी सब दुष्कर्मों से मुक्त हो जाते हैं। 

"डाँट माइंड सर! चमचा ही अपने साहब को हर प्रकार के कर्म दुष्कर्म से मुक्ति दिलवाता है। चमचा साहब के दिल दिमाग़ को जाम कर उसे कोमा की स्थिति में प्रवेश करवाता है। इसलिए सर! जो साहब अपने ऑफ़िस में अपने चमचों के पराक्रम को जानता है, वह स्वर्ग में भी अप्सराओं के बदले चमचों से ही घिरा रहता है। 

"सर! मुझ जैसे सात्विक चमचे में ही सारे साहब निवास करते हैं। तभी तो ज्ञानी से ज्ञानी साहब सारे काम छोड़ अपने चमचों की पूजा करते हैं। जिनके लिए कर्म जीवन नहीं, चमचे ही जीवन है, जिनके लिए चमचे ही महत्वपूर्ण होते हैं, वे नौकरी के सारे भोगों का दिल खोलकर उपभोग दुरुपयोग करते हैं।

"हे साहब! फ़ाइलों में मैं सबसे महत्वपूर्ण फ़ाइल हूँ। साहब के सब सीक्रेटों में मैं सबसे सीक्रेट हूँ। हर साहब का मैं गर्व हूँ। हर साहब का मैं गर्भ हूँ।  इसलिए साहब आप सबकी अवहेलना करो पर चमचे की कभी मत करो। क्योंकि चमचे में वह शक्ति होती है जो तोप गोलों में भी नहीं होती। चमचे में वह सम्मोहन होता है जो मोहिनी में भी नहीं होता।  

"हे साहब! इधर-उधर अपने को केंद्रित करने के बदले अपने को आँखें मूँद कर इस चमचे में केंद्रित करो, आपका भला इसीमें है। मैं आपकी चमचागिरी करूँ तो आप मुझ पर विश्वास करो। चमचों पर विश्वास करना हर साहब को लौकिक सुख प्रदान करता है। सर! मैं एकबार फिर अपने पर से भटके हुए विश्वास को विश्वास दिलाता हूँ  और दावे के साथ दावा करता हूँ कि ऐसा करने पर आपको गालियाँ देने वाला भी आपका अनन्य चमचा हो आपका पैट हो जाएगा।" 

यह सुन मैं उवाच, "क्षमाम्! क्षमाम्! चमचाश्री! अब मेरा क्षुद्र से क्षुद्र चमचे के प्रति बचाखुचा अज्ञान भी नष्ट हो गया। साहबी में चमचों की अहमियत को लेकर पहले से ही मेरी खुली आँखें और खुल गईं। टर्मिनेट हो जाऊँ जो आज से सपने में भी वरिष्ठ तो वरिष्ठ, कनिष्ठ चमचे पर भी शक करूँ। लो, तुम्हारे सिर पर लात रखकर कहता हूँ कि अब मैंने अपने को हर जाति प्रजाति के चमचों में स्थिर कर लिया। मैं अपनी बिरादरी की तरफ़ से तुम्हें वचन देता हूँ कि जब तक सिस्टम में अफ़सरी रहेगी, हर अफ़सर तुम्हारे वश में रहेगा। हर अफ़सर तुम्हारा उपासक रहेगा।"

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