रक्त-बीज की सीढ़ियाँ

01-05-2026

रक्त-बीज की सीढ़ियाँ

अमरेश सिंह भदौरिया (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

धूप अभी पूरी तरह फूटी नहीं थी। वह खेतों में पकी फ़सलों पर पड़कर सुनहरी आभा बिखेर रही थी, जैसे आसमान ने आग को रेशम जैसा कोमल बनाकर अभी-अभी धरती पर हौले से छिड़का हो। माधव ने अपने कंधे पर टँगे झोले को फिर से सँभाला। झोला केवल औज़ारों और बिखरे काग़ज़ों का नहीं था, उसमें उसकी अधूरी उम्मीदें और रोज़मर्रा की जद्दोजेहद भी भरी हुई थी। 

उसके पीछे सुमित्रा थी—सिर पर पुराने बर्तनों की टोकरी, गोद में छोटा मुन्ना, और चेहरे पर वह चुप्पी, जो बरसों के अभाव से पैदा होती है। सबसे पीछे मुन्नी चल रही थी। हाथ में बस्ता था, पर क़दमों में बचपन नहीं—सिर्फ़ सावधानी थी। 

यह रास्ता कोई साधारण रास्ता नहीं था। यह उन अदृश्य सीढ़ियों की शृंखला थी, जिनका हर पायदान किसी न किसी के ख़ून से गीला था। यह वही सीढ़ियाँ थीं—रक्त-बीज की सीढ़ियाँ—जहाँ हर पीढ़ी अपने हिस्से का ख़ून देकर अगले के लिए एक पायदान बनाती है, पर उस पायदान की धार कभी पूरी तरह कुंद नहीं होती। 

“बाबू . . . चप्पल में कंकड़ घुस गया . . . ” 

मुन्नी बैठ गई। 

माधव कुछ पल रुका। झुककर उसने कंकड़ निकाला। उसकी उँगलियाँ खुरदरी थीं, पर स्पर्श में एक अजीब कोमलता थी। 

“चल बिटिया . . . देर हो जाएगी,” उसने कहा। 

मुन्नी उठ खड़ी हुई। वह समझती थी—यह ‘देर’ सिर्फ़ समय की नहीं होती। 

उस दिन शहर में हड़ताल थी। बसें बंद थीं, रिक्शे नहीं थे। पर भूख कभी हड़ताल पर नहीं जाती। कारख़ाने के मालिक ने साफ़ कह दिया था—जो काम पर नहीं आएगा, उसकी दिहाड़ी कटेगी। 

माधव ने एक पल सोचा था—न जाए। पर उसी क्षण उसे मुन्नी की फ़ीस और मुन्ने का दूध याद आया। उसने सोचना बंद कर दिया। 

सुमित्रा ने साथ चलने की ज़िद की। 

“तुम अकेले जाओगे तो रास्ता और लंबा लगेगा,” उसने कहा। 

असल में वह जानती थी—यह दूरी सिर्फ़ पैरों से नहीं नापी जाती। 

रास्ते में बड़े-बड़े बँगले पड़े। ऊँची दीवारें, चमकते फाटक, भीतर फैली हरियाली। उनकी छाया सड़क पर गिरती, तो कुछ पल के लिए ठंडक मिलती। पर वह ठंडक वैसी ही थी, जैसे किसी और की थाली से गिरा हुआ टुकड़ा। 

“कभी हमारा भी ऐसा घर होगा?” 

सुमित्रा ने धीमे से पूछा। 

माधव ने जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ़ क़दम तेज़ कर दिए। 

कुछ दूर जाकर वे एक पेड़ की छाँव में बैठ गए। मुन्नी के पैर से ख़ून रिस रहा था। इस बार थोड़ा ज़्यादा। 

“कल स्कूल मत भेजना इसे,” सुमित्रा ने कहा। 

“और पढ़ेगी नहीं तो?” माधव का स्वर तेज़ हुआ।

“हमारी तरह यही सब झेलेगी?” 

सुमित्रा ने पहली बार सीधा जवाब दिया, “हमारी तरह तो वैसे भी झेल ही रही है।” 

दोनों चुप हो गए। यह बहस नहीं थी—एक सच्चाई थी। 

माधव ने सिर झुका लिया। उसे याद आया—पिछले साल जब वह बीमार पड़ा था, तब घर में अनाज ख़त्म हो गया था। सुमित्रा ने अपने गहने गिरवी रख दिए थे। उसे बाद में पता चला। वह कुछ कह नहीं पाया था। 

उस दिन के बाद से उसने समझ लिया था—इस घर में त्याग भी चुपचाप होता है, और दर्द भी। 

कारख़ाने पहुँचते-पहुँचते दोपहर ढल गई। गेट पर खड़ा गार्ड घड़ी देख रहा था। 

“आज बहुत देर कर दी,” उसने कहा। 

माधव ने सिर झुका लिया। यहाँ दूरी नहीं, समय गिना जाता है। 

अंदर मशीनों का शोर था—इतना कि अपनी सोचने की आवाज़ भी ख़ुद को सुनाई न दे। यह कोई साधारण शोर नहीं था, बल्कि एक निरंतर चलती हुई चीख़ थी, जिसमें लोहे से लोहा टकरा रहा था। माधव अपनी मशीन के सामने खड़ा हो गया। यहाँ की हवा में पसीने, जंग और जलते हुए तेल की एक ऐसी गंध बसी थी, जो फेफड़ों में उतरते ही भारीपन पैदा कर देती। 

उसके सामने वाली बेल्ट पर लोहे के गर्म पुर्जे तेज़ी से सरक रहे थे। उसे हर कुछ सेकंड में एक भारी लिवर खींचना था। लिवर का हैंडल बरसों के घर्षण से इतना चिकना हो गया था कि उस पर माधव की हथेलियों के निशानों की अपनी एक अलग ही ‘नक़्क़ाशी’ बन गई थी। 

आज उसकी उँगलियों के पोरों से हल्का ख़ून रिस रहा था—शायद मुन्नी के पैर से निकले कंकड़ की याद अब भी उसकी खाल में चुभ रही थी। जितनी बार वह लिवर खींचता, उसका कंधा चटकता, पर मशीनों के शोर में उस हड्डी की चटक सुनाई नहीं देती थी। मशीन को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि उसे चलाने वाला आज भूखा है या उसके घर में मुन्नी का भविष्य धुँधला हो रहा है। वह तो बस लोहा माँगती थी, और बदले में शरीर को पूरी तरह निचोड़ देती थी। 

खिड़की के एक छोटे से छेद से धूप की एक पतली किरण छनकर आ रही थी, जिसमें धूल के कण पागलों की तरह नाच रहे थे। माधव को लगा, वह भी उन्हीं धूल के कणों जैसा है—उजाले में दिखता तो है, पर उसका अपना कोई वुजूद नहीं, बस हवा के थपेड़ों और मशीनों की लय पर नाचते रहना ही उसकी नियति है। 

शाम होते-होते जब तेल और ग्रीस उसकी चमड़ी में गहरे समा गए, तब तक उसका शरीर एक पुर्जे में बदल चुका था। 

शाम को जब वह बाहर निकला, तो उसकी जेब में दिहाड़ी थी—पूरी नहीं, थोड़ी कटी हुई। 

“आधा दिन माना जाएगा,” मुंशी ने कहा था। 

माधव ने विरोध नहीं किया। शायद उसे उम्मीद भी नहीं थी। 

वापसी में उसने मुन्नी के लिए एक पेंसिल ख़रीदी। बहुत सस्ती। पर मुन्नी ने उसे ऐसे पकड़ा, जैसे वह कोई उम्मीद हो, जो टूटनी नहीं चाहिए। 

घर की दहलीज़ तक पहुँचते-पहुँचते सब निशब्द हो चुके थे। थकान रगों में इस क़द्र उतर आई थी कि कुछ कहने की कोशिश भी एक पहाड़ उठाने जितनी भारी लग रही थी। 

माधव की नज़र दीवार पर ठिठकी, जहाँ एक काग़ज़ अपनी ख़ामोशी में बहुत कुछ कह रहा था। उस पर उसने एक अधूरा ख़्वाब उकेरा था—एक परिवार, जो मंज़िल की ओर सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। हर सीढ़ी के किनारों पर भरा वह गहरा लाल रंग ऐसा लग रहा था, मानो संघर्ष की दास्तां बयाँ करने के लिए ख़ुद लहू ने रंग का रूप ले लिया हो। 

आज वह चित्र कुछ अलग लग रहा था। 

उसे लगा—यह सीढ़ियाँ ख़त्म नहीं होतीं। एक पीढ़ी चढ़ती है, दूसरी वहीं से शुरू करती है। और हर बार ख़ून बहता है, हर बार उम्मीद भी साथ चलती है। 

पर क्या सचमुच कुछ बदलता है? 

रात में जब सब सो गए, सुमित्रा ने धीरे से पूछा—

“आज कितने पैसे मिले?” 

माधव ने सच बता दिया। 

सुमित्रा ने कुछ देर चुप रहकर कहा—

“कल राशन कैसे आएगा?” 

यह सवाल किसी एक दिन का नहीं था। 

माधव ने छत की ओर देखा। वहाँ कोई जवाब नहीं था। 

“मुन्नी की फ़ीस . . . फिर देर से भरनी पड़ेगी,” उसने धीमे से कहा। 

सुमित्रा ने सिर हिला दिया। उसे आदत थी। 

अगले हफ़्ते स्कूल से नोटिस आया। 

मुन्नी चुपचाप काग़ज़ लेकर आई और माँ के पास रख दिया। सुमित्रा पढ़ नहीं पाती थी, पर काग़ज़ के स्वर को पहचानती थी। उसने वह माधव को दे दिया। 

माधव ने पढ़ा—

“फ़ीस न जमा होने के कारण छात्रा को कक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी।” 

उसके हाथ काँप गए। यह सिर्फ़ एक नोटिस नहीं था—जैसे किसी ने उसकी बेटी के पैरों के नीचे की एक सीढ़ी खींच ली हो। 

“बाबू . . . मैं कल स्कूल जाऊँ?” 

माधव ने उसकी ओर देखा। उसके पास जवाब था—पर वह झूठ होता। 

“कल . . . मत जाना,” उसने धीरे से कहा। 

मुन्नी ने सिर हिला दिया। जैसे वह पहले से जानती हो। 

अगली सुबह पहली बार ऐसा हुआ कि मुन्नी ने बस्ता नहीं उठाया। वह दरवाज़े पर बैठी रही। सड़क से बच्चे गुज़र रहे थे—कंधों पर बस्ते, आँखों में वही चमक, जो कभी उसकी आँखों में भी थी। 

उसने धीरे से अपनी पेंसिल निकाली। ज़मीन पर रेखाएँ खींचीं। 

“क्या बना रही है?” 

“सीढ़ियाँ . . . ” 

रेखाएँ सीधी नहीं थीं। हाथ काँप रहा था। 

दोपहर में माधव लौटा। उसने मुन्नी को वहीं बैठे देखा। 

“स्कूल नहीं गई?” 

“आपने मना किया था . . . ” 

माधव चुप हो गया। उसकी नज़र ज़मीन पर गई—जहाँ खुरदुरी रेखाओं से बनी सीढ़ियाँ थीं। हर पायदान के किनारे उसने ईंट का चूरा रगड़कर लाल रंग भरा था। 

“ऊपर तक क्यों नहीं बना रही?” 

मुन्नी ने धीरे से कहा—

“बनती नहीं . . . बार-बार कट जाती हैं।” 

माधव के भीतर कुछ टूट गया। 

उसे पहली बार साफ़ दिखा—कि ये “रक्त-बीज की सीढ़ियाँ” जिन पर वह चल रहा है, वही अब उसकी बेटी के हाथों में अधूरी रह गई हैं। 

उस रात घर में चूल्हा जला, पर बात नहीं हुई। 

दिन बीतते गए। मुन्नी अब घर के काम करने लगी। बस्ता एक कोने में पड़ा रहता। कभी-कभी वह उसे खोलती, पन्ने पलटती, फिर चुपचाप बंद कर देती। 

माधव रोज़ काम पर जाता। रोज़ लौटता। पर अब हर दिन उसे एक चीज़ और दिखती—मुन्नी की आँखों से ग़ायब होती चमक। 

एक दिन उसने हिम्मत करके कहा—“फिर से स्कूल भेजेंगे तुझे . . . ” 

मुन्नी ने पूछा—“कब?” 

यह ‘कब’ एक आईना था। 

“जल्दी . . . ” 

पर वह ख़ुद भी जानता था—यह ‘जल्दी’ उतना ही अनिश्चित है, जितनी यह पूरी चढ़ाई। 

रात के सन्नाटे में वह फिर उसी चित्र के सामने खड़ा था। दीवार पर बनी सीढ़ियाँ आज और लाल लग रही थीं। 

उसे लगा—

हर ख़ून बीज नहीं बनता।

कई बार वह सिर्फ़ बह जाता है, बिना कुछ उगाए। 

“रक्त-बीज की सीढ़ियाँ” कोई प्रेरक गाथा नहीं है, जो किसी सुनहरी मंज़िल पर जाकर ख़त्म हो। यह तो एक निष्ठुर चक्र है—जहाँ हर पीढ़ी अपनी रगों का आख़िरी क़तरा इन ठंडी सीढ़ियों में इसलिए उड़ेल देती है, ताकि अगली पीढ़ी के पैरों को थोड़ा कम दर्द हो। पर सीढ़ियाँ वह लहू पीकर और चिकनी हो जाती हैं। 

मंज़िल यहाँ कोई मुक़ाम नहीं, बस एक थकाऊ ठहराव है। 

सच तो यह है कि ये सीढ़ियाँ कभी ख़त्म नहीं होतीं। ये वहीं की वहीं खड़ी रहती हैं, बस चढ़ने वाले चेहरे बदल जाते हैं। हर नया चेहरा उसी पुरानी थकान को ओढ़ लेता है, और हर नया पैर उसी पुराने ज़ख़्म को विरासत में पाता है। 

फिर भी, लोग चलते हैं। 

माधव भी चलेगा। वह कल फिर उठेगा, अपने फटे हुए झोले में उन अधूरी उम्मीदों को ठूँसेगा और घर से निकल जाएगा। इसलिए नहीं कि उसे रास्ता पार करने का यक़ीन है, बल्कि इसलिए क्योंकि पीछे हटने का रास्ता अब बचा ही नहीं है। 

उसके पास अब उम्मीद का कोई क़तरा शेष नहीं, बस एक अंतहीन मजबूरी है। और शायद यही इन सीढ़ियों की सबसे बड़ी जीत है—कि इन्हें सींचने के लिए उम्मीद की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ़ 'बेबसी' ही इन्हें ज़िंदा रखने के लिए काफ़ी है। 

माधव के बाद अब मुन्नी उन खुरदुरी रेखाओं पर अपना लहू रँगेगी . . . और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा। क्योंकि जहाँ रास्ता ख़त्म होने की कोई शर्त न हो, वहाँ सिर्फ़ ‘चलते रहना’ ही एकमात्र गंतव्य बन जाता है। 

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