शब्दों से परे एक दिन
अमरेश सिंह भदौरिया
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल पंचांग की तिथियाँ नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर उतरने के अवसर होते हैं। वे ऐसे पड़ाव हैं जहाँ समय कुछ क्षणों के लिए ठहरता है और जीवन अपनी गति को स्वयं देखता है। मौनी अमावस्या भी ऐसा ही एक दिन है—जहाँ बाहरी दुनिया की चहल-पहल के बीच भीतर की दुनिया हमें मौन होकर पुकारती है। यह दिन कोई कर्मकांड मात्र नहीं, बल्कि आत्मा के द्वार पर दिया गया एक निमंत्रण है—अपने ही अस्तित्व से साक्षात्कार का।
मनुष्य का जीवन शब्दों से भरा है। हम बोलते हैं, सुनते हैं, लिखते हैं, सोचते हैं—और इन सबके बीच कहीं खो जाते हैं। शब्द हमारी सुविधा हैं, पर धीरे-धीरे वही हमारे बोझ बन जाते हैं। हम जितना अधिक बोलते हैं, उतना ही कम सुन पाते हैं—दूसरों को भी और स्वयं को भी। मौनी अमावस्या इस प्रवाह के विरुद्ध खड़े होने का दिन है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन का गूढ़तम सत्य शब्दों से परे है। जहाँ भाषा थक जाती है, वहीं से अनुभव का आरंभ होता है।
अक्सर मौन को दुर्बलता समझ लिया जाता है, जैसे चुप रहना किसी हार का संकेत हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। मौन अत्यंत सशक्त अवस्था है। यह वह भूमि है जहाँ विचार जन्म लेते हैं और जहाँ चेतना अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है। शास्त्रों में कहा गया है—“मौनं स्वार्थ साधनम्।” यह कथन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक सत्य को भी उद्घाटित करता है। जब हम मौन होते हैं, तब हमारी ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि सघन होती है। दिनभर के अनावश्यक संवाद, प्रतिक्रियाएँ, तर्क-वितर्क हमारी मानसिक शक्ति को क्षीण करते रहते हैं। मौन उस शक्ति को पुनः एकत्र करने की प्रक्रिया है।
माघ मास की अमावस्या का संगम से जुड़ाव केवल पौराणिक नहीं, प्रतीकात्मक भी है। गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन बाहर जितना महत्त्वपूर्ण है, भीतर उससे कहीं अधिक। गंगा भक्ति की धारा है—समर्पण की। यमुना कर्म का प्रवाह है—गतिशील जीवन का। और सरस्वती वह अदृश्य ज्ञान-धारा है जो भीतर बहती है, पर दिखाई नहीं देती। यह तीनों तभी मिलती हैं जब मनुष्य मौन होता है। जब भीतर का शोर शांत होता है, तभी ज्ञान प्रकट होता है, तभी कर्म शुद्ध होते हैं और तभी भक्ति हृदय में उतरती है। संगम वास्तव में नदी-तट पर नहीं, चेतना में घटित होता है।
आज का मनुष्य मौन से डरता है। अकेलापन उसे असहज करता है। जैसे ही बाहर की आवाज़ें कम होती हैं, भीतर की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं—और वही सबसे अधिक भयावह लगती हैं। पछतावे, अधूरे प्रश्न, दबे हुए दुःख, असंतोष—ये सब मौन में उभरते हैं। इसलिए हम हर क्षण किसी न किसी शोर की तलाश में रहते हैं—मोबाइल, सोशल मीडिया, संगीत, समाचार। मौनी अमावस्या इस भय से आँख मिलाने की शिक्षा देती है। यह कहती है—भागो मत। जो भीतर है, उसे देखने का साहस करो। क्योंकि जिन विचारों से हम भागते हैं, वही हमें भीतर से खोखला करते हैं।
मौन का अर्थ स्वयं को दंडित करना नहीं है। यह आत्म-करुणा का अभ्यास है। यह स्वयं को सुनने की कला है। जब हम बोलना बंद करते हैं, तब पहली बार हमें यह अनुभव होता है कि हमारे भीतर कितना कुछ अनकहा पड़ा है। मौन में हम दूसरों के नहीं, अपने साक्षी बनते हैं। धीरे-धीरे विचारों की गति मंद होती है। मन, जो निरंतर भविष्य और अतीत के बीच भटकता रहता है, वर्तमान में टिकने लगता है। यही मौन की साधना है।
मौन के भी स्तर होते हैं। सबसे पहला स्तर है—वाणी का मौन। यह सरल है, पर टिकाऊ नहीं। इसके बाद आता है—मन का मौन। यहाँ शब्द तो नहीं होते, पर विचार अब भी चलते रहते हैं। अभ्यास के साथ विचारों की यह भीड़ छँटने लगती है। और अंततः वह अवस्था आती है जहाँ मौन कोई प्रयास नहीं रह जाता। वहाँ व्यक्ति मौन धारण नहीं करता, बल्कि मौन हो जाता है। यह अस्तित्वगत मौन है—जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद मिट जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ आत्मा अपने मूल स्रोत को पहचानती है।
मौनी अमावस्या पर दान का विशेष महत्त्व भी इसी कारण है। मौन हमें संवेदनशील बनाता है। जब हम कम बोलते हैं, तब अधिक महसूस करते हैं। दूसरों की पीड़ा, उनकी आवश्यकता, उनका अस्तित्व हमें अधिक स्पष्ट दिखने लगता है। दान केवल देने की क्रिया नहीं, बल्कि अपने भीतर जमे अहंकार को ढीला करने की प्रक्रिया है। जब हम कुछ त्यागते हैं, तो वास्तव में हम स्वयं को हल्का करते हैं। मौन और दान मिलकर मनुष्य को ‘स्व’ से ‘सर्व’ की यात्रा पर ले जाते हैं।
आधुनिक समय में मौनी अमावस्या की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह सूचना के अतिरेक का युग है। हम हर क्षण जानकारियों से घिरे रहते हैं, पर समझ से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में मौन एक प्रकार का ‘डिजिटल डिटॉक्स’ है—पर उससे भी अधिक, यह आत्मिक डिटॉक्स है। यह हमें सिखाता है कि हर बात पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं। कभी-कभी रुक जाना, ठहर जाना ही सबसे गहरी प्रतिक्रिया होती है। शान्ति बाहर के शोर को बंद करने से नहीं आती, बल्कि भीतर के संगीत को सुनने से आती है।
कहा गया है—“मौन परमात्मा की भाषा है, बाक़ी सब उसका अपूर्ण अनुवाद।” इस वाक्य में मौनी अमावस्या का पूरा दर्शन समाहित है। परम सत्य को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। उसे जिया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है—और वह अनुभव मौन में ही सम्भव है।
मौनी अमावस्या के बहाने हम अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि ब्रह्मांड की सबसे प्रबल ऊर्जा शान्ति में निवास करती है। संगम की लहरों पर पड़ती सूर्य-किरणें और मौन खड़े श्रद्धालु—दोनों मिलकर एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। कि जीवन की सबसे ऊँची अनुभूति शब्दों में नहीं, उस गहरे सन्नाटे में है जहाँ आत्मा स्वयं से संवाद करती है।
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहीं से अनुभव प्रारंभ होता है। मौनी अमावस्या उसी अनुभूति का पर्व है।
आइए, इस मौनी अमावस्या पर हम केवल जिह्वा को नहीं, अपने विचारों को भी विश्राम दें। उस मौन को अनुभव करें जो रिक्त नहीं, बल्कि पूर्ण है। वही मौन जो हमारे अस्तित्व का आधार है, और वही मौन जो हमें वास्तविक अर्थों में मनुष्य बनाता है।
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