कुटुंब की तस्वीर में
जिसने जीवन रंग भरा।
शाम ढले मायूस हुआ
कैसे वो चेहरा।
1.
क्या-क्या किये प्रयास
और क्या-क्या विपदाएँ झेलीं।
करुणा भरी निगाह से
अपनी देखी कहाँ हथेली।
मेहनत को प्रतिविम्बित
करता है घट्ठा उभरा।
शाम ढले मायूस हुआ
कैसे वो चेहरा।
2.
घात और प्रतिघातों से
वो रहा खेलता खेल।
उम्र निचोड़-निचोड़ दिया
सूखी बाती में तेल।
सपना उसकी उम्मीदों पर
सच क्यों न उतरा।
शाम ढले मायूस हुआ
कैसे वो चेहरा।
3.
फौलादी कंधों पर
अपने थामे रखा आसमान।
जीवन से जुड़ी हर
मुश्किल किया स्वयं आसान।
अरमानों की फसल में
सारी रात दिया पहरा।
शाम ढले मायूस हुआ
कैसे वो चेहरा।
4.
परिश्रम के पसीने से
सींची हर एक क्यारी।
माली के मानिंद निभायी
अपनी ज़िम्मेदारी।
उपवन की शोभा में
"अमरेश" त्याग छिपा गहरा।
शाम ढले मायूस हुआ
कैसे वो चेहरा।

0 Comments

Leave a Comment