ये रिक्तता, ये ख़ालीपन

15-12-2025

ये रिक्तता, ये ख़ालीपन

महेश रौतेला (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

ये रिक्तता, ये ख़ालीपन
तेरा होना बतलाता है, 
यह सन्नाटा, यह सूनापन
तेरा रहना कहता है। 
 
ये फूलों की मालायें
तुझे यहाँ पूछ रही हैं, 
ये घर की आवाज़ें
तुझे स्नेह से खोज रही हैं। 
 
ये जो धूप बैठी है
बस, प्रतीक्षा करती है, 
दूर गगन के छोरों पर
शायद आत्मा रहती है। 
 
ये घर का दरवाज़ा
तुम्हारी आहट सुनता है, 
ये रिक्तता, ये ख़ालीपन
तेरा होना बतलाता है। 
 
ये जो राह दिखती है
तुम्हें सदा बुलाती है, 
घर के अन्दर की हलचल
तुम्हारे संग-संग चलती है। 
 
ये यात्राओं का चलना
तुम्हें इधर बुलाता है, 
ये तीर्थों की अमर आस्था
अद्भुत कहने आती है। 
 
ये सोना और जगना भी
तेरा होना बतलाता है, 
वह पूजा का स्वर-संगम
मन को शान्त करता है। 
 
सारे मनमुटावों में
तेरी सुगंध आती है, 
तेरे आने-जाने की
सुगबुगाहट पूरी रहती है। 
 
अब दरवाज़े कम खुलते हैं
सपनों में आना-जाना है, 
दुधिया रंग की परछाई का
अब घर में आना-जाना है। 
 
सब दिया जलाने आते हैं
पर तमस फिर भी रहता है, 
युगों की चीरफाड़ करो तो
जीना-मरना दिखता है। 

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